माँ
तुम हो नम आँखों का धुंवा
यादों का है
कोई भरा हुआ कुंवा
जिसे नही झांकता है कोई
पर माँ
तुम वो, हो
जो, उन आवाजों को
महसूस करती हो
आज तक
उदाश आँखों में
सामने तपती दोपहरी में
आँगन का उदास कोना
जैसे कंही सुस्त रहा हो
सिपहिया पक्षी
माँ
तुम नही बनाती हो
आचार पर
महसूस करती हो
उसे कहते हुए
मेरे चटखारे लेते ओठों को
माँ
तुम रोज बुलाती हो , मुझे
और भोर से उठकर
तकती हो राह
माँ
अलगनी पर
यूँ ही सूखते
तुम्हारे उतारे हुए
बिना धोये कपडे
हफ्तों हमारी उपेक्षा पर
हिकारत से पड़े रहते है
माँ
क्यों तुम
हमारे लिए
दुनिया की
सबसे बेकार
गयी गुजरी वास्तु हो
तुम हो नम आँखों का धुंवा
यादों का है
कोई भरा हुआ कुंवा
जिसे नही झांकता है कोई
पर माँ
तुम वो, हो
जो, उन आवाजों को
महसूस करती हो
आज तक
उदाश आँखों में
सामने तपती दोपहरी में
आँगन का उदास कोना
जैसे कंही सुस्त रहा हो
सिपहिया पक्षी
माँ
तुम नही बनाती हो
आचार पर
महसूस करती हो
उसे कहते हुए
मेरे चटखारे लेते ओठों को
माँ
तुम रोज बुलाती हो , मुझे
और भोर से उठकर
तकती हो राह
माँ
अलगनी पर
यूँ ही सूखते
तुम्हारे उतारे हुए
बिना धोये कपडे
हफ्तों हमारी उपेक्षा पर
हिकारत से पड़े रहते है
माँ
क्यों तुम
हमारे लिए
दुनिया की
सबसे बेकार
गयी गुजरी वास्तु हो
No comments:
Post a Comment