कल मकर संक्राति होगी, परसो भी, ऐसे में बुआ जी और माँ याद अ रही है, बुआ जी , तो एक दिन पहले ही अकेले ही दो-३ तरह के लड्डू बनाती थी,और सबको बांटती थी, जो अपने लिए बनाते वंही कंवलों काम करने वालों को बंटते थे ,और घर का आँगन से लेकर भीतरी कक्ष तक तिल के भुनने की सोंधी महक फैली होती थी
और कितने पक्षी हमारे इर्द-गिर्द के परिवेश में जैसे नेपथ्य का संगीत रचते थे, आज वह संगीत कंही खो सा गया है, वो संगीत गाने वाले जिंदगी को गुनगुनाने वाले पक्षी भी तो नही रहे , एकाध कंही से आँगन में आ जाता है, तो आँखें भींग जाती है, की हमने पक्षियों के घर-घोसले दरख्तों को मिटा दिए है, ये सब क्यों, की हमे ऐसे सुने घर चाहिए, जन्हा न तो असली ऊल होंगे, न पक्षियों के बसेरे , जो सबेरे अपने घोसलों से निकल कर जाने कहा उड़कर जाते है, और साँझ ढलने के पहले लौट आते है,
मेरा मन होता है, ये पखेरुओं त्तं, कौन देश जाते हो.....
तिनका तिनका जोड़कर घर बनाने की कला भी तो, इन्ही पखेरुओं से आती है
दरअसल बुआ जी के घर हम जन्हा रहते थे , वंहा इर्द-गिर्द पेड़ों व् लतरों के झुरमुट थे, वंहा सब कुछ था, रीठे का पेड़, जिसे हम पानी से भिगो कर साबुन जैसा झाग निकालते थे, पर उपयोग नही पता था, आज मालूम है, तो रीठे का झाड़ नज़र नही आता , कितने दरिद्र हो गए है हम, खलिश घर बनाने के लिए, सब- उजड़ने पर तुले है, कितने स्वार्थी हो गए है, अपने सुखो-आराम के लिए , पेड़ों व् प्राणियों की कितनी प्रजातियों को लुप्त कर गए. पक्षियों का अत-पता नही मिला , मैं बालाघाट से बनारस तक गगयी , पर पक्षी अब पूर्व-वत नही रहे, इधर गांव व् वनों में पक्षी शिकार किये जा रहे है, कुछ एक्सपोर्ट हो रहे है आप तो, सब-कुछ जानते है
अच्छा आप ये बताईये , कि आपने कंही जुगनू को देखा है, मैं अपने किशोरावस्था में एक नदी किनारे के गांव गयी थी, वंहा इतने जुगनू थे , ओह
आज हम इन सबसे महरूम हो गए है, जिन्हे हम बचा सकते थे, यदि पेड़ों के झुरमुट बचा सके तो। ..........
और कितने पक्षी हमारे इर्द-गिर्द के परिवेश में जैसे नेपथ्य का संगीत रचते थे, आज वह संगीत कंही खो सा गया है, वो संगीत गाने वाले जिंदगी को गुनगुनाने वाले पक्षी भी तो नही रहे , एकाध कंही से आँगन में आ जाता है, तो आँखें भींग जाती है, की हमने पक्षियों के घर-घोसले दरख्तों को मिटा दिए है, ये सब क्यों, की हमे ऐसे सुने घर चाहिए, जन्हा न तो असली ऊल होंगे, न पक्षियों के बसेरे , जो सबेरे अपने घोसलों से निकल कर जाने कहा उड़कर जाते है, और साँझ ढलने के पहले लौट आते है,
मेरा मन होता है, ये पखेरुओं त्तं, कौन देश जाते हो.....
तिनका तिनका जोड़कर घर बनाने की कला भी तो, इन्ही पखेरुओं से आती है
दरअसल बुआ जी के घर हम जन्हा रहते थे , वंहा इर्द-गिर्द पेड़ों व् लतरों के झुरमुट थे, वंहा सब कुछ था, रीठे का पेड़, जिसे हम पानी से भिगो कर साबुन जैसा झाग निकालते थे, पर उपयोग नही पता था, आज मालूम है, तो रीठे का झाड़ नज़र नही आता , कितने दरिद्र हो गए है हम, खलिश घर बनाने के लिए, सब- उजड़ने पर तुले है, कितने स्वार्थी हो गए है, अपने सुखो-आराम के लिए , पेड़ों व् प्राणियों की कितनी प्रजातियों को लुप्त कर गए. पक्षियों का अत-पता नही मिला , मैं बालाघाट से बनारस तक गगयी , पर पक्षी अब पूर्व-वत नही रहे, इधर गांव व् वनों में पक्षी शिकार किये जा रहे है, कुछ एक्सपोर्ट हो रहे है आप तो, सब-कुछ जानते है
अच्छा आप ये बताईये , कि आपने कंही जुगनू को देखा है, मैं अपने किशोरावस्था में एक नदी किनारे के गांव गयी थी, वंहा इतने जुगनू थे , ओह
आज हम इन सबसे महरूम हो गए है, जिन्हे हम बचा सकते थे, यदि पेड़ों के झुरमुट बचा सके तो। ..........
No comments:
Post a Comment