Saturday, 29 June 2013

बुआ जी बहुत याद  आती है . वे जिस तरह , जीवन के अंतिम वक्त में अकेली हो गयी थी, उनके दत्तक बेटे ने उनकी जो गति की थी, ये याद करके , मन कांप जाता है .
उनके घर की बातें तो , कई बार दोहराती रही हूँ .किन्तु, मेरे उनके घर से लौट जाने के बाद वो कितनी दुखी हुई थी, इसका अनुमान आज लगती हूँ . माँ बता रही थी, कि वो मेरे आ जाने के बाद बहुत रोटी थी .अकेलापन कितना तोड़ देता है, ये बुआ जी की तब की हालत को याद करके सोचती हूँ .
वो, नींद में जोरों से चीखती थी, किन्तु जागने पर अपना दुःख नही बयाँ कर  पाती थी, सच , बुआ जी, मै आपकी मदद नही क्र सकी , क्यूंकि, तब मै जिन जंजालों में उलझी थी, मेरी हालत भी तो, कतई ठीक नही थी .मै तो, अपने होशो-हवाश में तक नही थी . मुझे psc या cj दो ही जॉब के torget पूरे करने थे .