माँ से कल बातें हुई
वो, आवाज भी अब ठीक नही आती
वो, कह रही थी की आचार खाना है
कल, उसके लिए वंही भेज रही
माँ , तुम हमारे लिए
क्या क्या बनाती थी
पर्वों में बहुत याद आती है
माँ , तुम्हे याद करते ,
आज भोर में उठते ही
छत पर गयी थी
वो, आवाज भी अब ठीक नही आती
वो, कह रही थी की आचार खाना है
कल, उसके लिए वंही भेज रही
माँ , तुम हमारे लिए
क्या क्या बनाती थी
पर्वों में बहुत याद आती है
माँ , तुम्हे याद करते ,
आज भोर में उठते ही
छत पर गयी थी