Monday, 7 September 2015

 कल, रात मामा जी नही रहे 
मुझे बचपन के  याद आये , जब हम सभी मामा-गांव जाते थे, गर्मियों में 
वंहा मां जी भी अपने परिवार सहित आते थे, बहुत अच्छे थे वे, बाहर वे सर्विस करते थे 
 शांत स्वाभाव के, और मुस्कराकर बातें करते थे 
मेरा  था,
बुआ  घर से माँ के घर  जाती थी, ज्यादातर पेंट शर्ट पहनती और ,मेरे घुंगराले बाल , मेरे माथे पर ऐसे बिखरते की, आँखे आँखे तक ढक जाती थी, अपनी बिखरी घुंगराली लटों से झांकती मेरी तेज बड़ी बड़ी  आँखें,दीदी बताती   चिल्लाती थी ,  से बालों को  नही ,
सारे वक़्त हाथों  धनुष-बाण लेकर खेलना, यूँ  ,रामलीला की नकल करना , और राधेश्याम के दोहे बोलना, ये  थे , मेरे शौक 
माँ रोटी  सिखाती थी , वो, पहले बोलती, एक लाइन लाइन मई दूसरी लाइन बोलती थी 
माँ कहती , -शुद्धि करो, …। मई कहती ---शुद्ध काम 
माँ कहती ---  भक्ति करो , मई ----भगवत मिले 
माँ---युक्ति करो  , मई कहती  ---आदर  मिले मिले 
माँ कहती -----भगति के ----, मई जोरो  से चिल्लाकर  कहती ----भक्ति  जगधाम 
वाकई वे