Friday, 23 December 2011

aangan

वो बहुत बड़ा  आंगन होता था, उसके बाहर एक दूसरा आंगन होता,  दोनों आंगन चहारदीवारी से घिरे होते, जन्हा कई फूलों की क्यारियां व् बेलें होती, वो खुशनुमा आँगन होता, आज भी है ,पर हम पराये है. उन आंगनों को गोबर से लिप कर रखते ,ताकि वंहा अनाज डाला जा सके. यूँ भी साफ सुथरा रखने कम्वाले  होते .
उन कामवालों को दर्द आज महसूस होता है, जब अपने bchche दुसरो के यंहा कम करते है. वो बेचारे गांवके सीधे लोग मुझे इसलिए याद है की, वो हमारे घर काम पर उन्हें क्या मिलता, कुछ कूडो धान, जिसका वो चावल बनाते.
कुछ नौकरों की घरवाली भी दिनमे काम पर आती. उन्हें क्या मिलता और पुरता होगा ,ये चितन का विषय है.
वो बेचारे तीज त्यौहारों को भी मुस्किल से नये कपड़े बना पाते थे. उन्हें किसी दिन रोक्के काम कराते  ,खाने में चावल चटनी या कम सब्जी दी जाती, उन्हें चाय भी ठीक नही देते, या पतली देते.
गाँवों में उनदिनों बहुत अनाज, धान, अरहर ,उड़द ,तिल सब होता था, फिर भी गाँव वाले बहुत कंजूसी करते, अपने kamvalon  को शादी ब्याह, तीज त्यौहारों में उन्हें खभी तोहफे नही देते, जैसे की विदेशी लोग नव वर्ष पर जरूरत मंद गरीबों को देते है.
उन आंगनों में एक बात अच्छी थी, की हमारे बाबूजी किसी को न नही करते थे,जितने लोग काम चाहते, उन्हें अवस्य बुलाते, उनके संग मिलकर काम  हंसी मजाक करते. बाबूजी की चली, तब तक काम खेती सब चला.
अब वक़्त बेहतर है, कामवालों को ज्यादा मजदूरी मिल रही है, हमारी जमीन छीन गयी, वो लोग मेह्नत कर मुझसे आगे है,मुझे इसबात की बहुत खुसी है.
आँगन अब भी है ,पर सूने है,उन्हा उतने kamwale  नही,पर घरवाले तो है, खेती की रौनक होती है उसकी फसल se

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