नही
नही पता
ये जिंदगी
बैनगंगा से
गंगा जी तक
कैसे चली गयी
कितने लोग मिलते रहे
बिछुरते रहे
और मई सभी को सपनों की तरह
संजोती रही
ये भी नही समझा
की, सब क्यों मिल जाते है बस
इतना जानती हूँ
कि मई कुछ खास हूँ
जन्हा सभी मुझे मिलते है
और अनायास मुझे सबका स्नेह भी मिलता है
नही पता
ये जिंदगी
बैनगंगा से
गंगा जी तक
कैसे चली गयी
कितने लोग मिलते रहे
बिछुरते रहे
और मई सभी को सपनों की तरह
संजोती रही
ये भी नही समझा
की, सब क्यों मिल जाते है बस
इतना जानती हूँ
कि मई कुछ खास हूँ
जन्हा सभी मुझे मिलते है
और अनायास मुझे सबका स्नेह भी मिलता है
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