Monday, 27 April 2015

मेरे
मेरे प्यारे आँगन 
नही पता क्यों 
तुम इतने ज्यादा पढ़े जाते हो जबकि,
मई तुम्हे नही लिखती ज्यादा न, ही तुम्हारा 
प्रचार ही करती हूँ तुम, फिर भी 
बनारस की बयार से 
आगे चलते हो क्या कहु 
तुम्हारी इस पससंद 
पसंद व् प्रोग्रेस पर 

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