Monday, 24 November 2014

 बुआ जी 
आज आपकी बहुत याद आती है 
मई उस गांव तक गयी थी 
जन्हा से बचपन में मई 
आपके साथ , बैलगाड़ी में जाती थी जब, मई छोटी सी थी 
तभी से उन राहों से आपके संग जाती थी 
और , मुझे वो मंदिर बहुत बड़ा लगता था 
वंहा श्रद्धालुओं की पंक्ति खड़े होकर 
प्रार्थना करती थी 
अब वो सब नही है 
बहुत वक़्त गुजर चूका है 
बुआ जी, आप बहुत दूर चली गयी हो 
सिर्फ आपकी यादें है 
वे रस्ते , अब वंहा नही जाउंगी 
मुझे अपने बेटे का जीवन संवरना है इश्लीए 
सब भुला के 
नई खुशियों को आमंत्रित करना चाहती हूँ 
बुआ जी आप भी मेरे घर में खुशियों को सहेजते देखना चाहती हो 
आपका आशीर्वाद व् दुआएं मेरे साथ है 
मई, जरूर सफल होउंगी 
इश्लीए, मैंने, 
वंहा मंदिर में अपने बचपन के साथी 
कृष्ण से प्रार्थना की है 

Saturday, 22 November 2014

बबचपन 

बचपन का साथी , है मेरा गांव 
कल , मई अपने बचपन के गांव गयी थी, 
उन राहों से गुजरते जो अनुभूति हो रही थी 
उसे शब्दों में बंधना संभव नही 
बीएस यूँ लग रहा था, 
कितने बरसों पहले , यंहा से मेरे जीवन की यात्रा आरम्भ हुई थी 
बाबूजी के गांव से बुआजी के गांव के बीच मेरा आना जाना लगा रहा था 
वंही रस्ते इ एक मंदिर मिलता था 
मंभाव पंथ का छोटा सा नदिर 
समाज की विविधता को अपने में समेटे , 
गांव का जीवन 
वो, मंदिर मेरी स्मृतिओं में बचा रहा 
कल, बेटे संग उसे देखने निकली 
और वंहा पहुँच कर पल, भर को लगा की 
अपने विगत जीवन में पहुँच गयी हूँ 
जन्हा बुआ जी के संग मई बैलगाड़ी से जाती थी, 
और वो, मंदिर आरतियों से गूंजता होता था 
कितना छोटा सा मंदिर 
किन्तु, आस्था उतनी ही प्राचीन और विराट 
मन को बहुत शांति महसूस होती रही 
क्रमशः 

Wednesday, 19 November 2014

रतरात बहुत ज्यादा ठण्ड थी 
माँ की बार बार याद आती रही 
माँ को बहुत जाड़ा लगता है 
माँ को गर्म कपडे मिलने चाहिए 
सुबह उठकर 
अपने इंस्पेक्टर भाई को कॉल की 
की माँ को गर्म कपडे भेजिए 
माँ ठण्ड नही बर्दास्त कर पाती 

Wednesday, 12 November 2014

माँ के पास

माँ को देने को 
किसी के पास कुछ नही है 
न वक़्त ,
न कुछ उपहार 
ऐसे ही बिट जाते है 
रूखे-सूखे 
माँ के समस्त त्यौहार 

Monday, 3 November 2014

आधे अधूरे मन से लिखा ये ब्लॉग 
बनारस की बयार से बहुत आगे रहा है 
मन कंही लगता नही 
इधर से उधर भागता है सब कहते है 
अपने बीते दिनों को मन याद करो 
किन्तु बुआ जी को भूल जाने का मन नही होता 
उनका  स्नेह व् उनके घर का वििस्तृत आँगन याद आता है 
जन्हा हम अकेले थे 
किन्तु, मोहल्ले वाले सारा दिन व् शाम तक 
बैठने आते थे 
आज हमारे पास वत नही किन्तु तब ऐसा नही था 
सच बहुत याद आते है 
वे पुरसकुं दिन और 
उसकी यादें, मासूम सि…। 
दिल को सहलाती हुई