आधे अधूरे मन से लिखा ये ब्लॉग
बनारस की बयार से बहुत आगे रहा है
मन कंही लगता नही
इधर से उधर भागता है सब कहते है
अपने बीते दिनों को मन याद करो
किन्तु बुआ जी को भूल जाने का मन नही होता
उनका स्नेह व् उनके घर का वििस्तृत आँगन याद आता है
जन्हा हम अकेले थे
किन्तु, मोहल्ले वाले सारा दिन व् शाम तक
बैठने आते थे
आज हमारे पास वत नही किन्तु तब ऐसा नही था
सच बहुत याद आते है
वे पुरसकुं दिन और
उसकी यादें, मासूम सि…।
दिल को सहलाती हुई
बनारस की बयार से बहुत आगे रहा है
मन कंही लगता नही
इधर से उधर भागता है सब कहते है
अपने बीते दिनों को मन याद करो
किन्तु बुआ जी को भूल जाने का मन नही होता
उनका स्नेह व् उनके घर का वििस्तृत आँगन याद आता है
जन्हा हम अकेले थे
किन्तु, मोहल्ले वाले सारा दिन व् शाम तक
बैठने आते थे
आज हमारे पास वत नही किन्तु तब ऐसा नही था
सच बहुत याद आते है
वे पुरसकुं दिन और
उसकी यादें, मासूम सि…।
दिल को सहलाती हुई
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