Monday, 3 November 2014

आधे अधूरे मन से लिखा ये ब्लॉग 
बनारस की बयार से बहुत आगे रहा है 
मन कंही लगता नही 
इधर से उधर भागता है सब कहते है 
अपने बीते दिनों को मन याद करो 
किन्तु बुआ जी को भूल जाने का मन नही होता 
उनका  स्नेह व् उनके घर का वििस्तृत आँगन याद आता है 
जन्हा हम अकेले थे 
किन्तु, मोहल्ले वाले सारा दिन व् शाम तक 
बैठने आते थे 
आज हमारे पास वत नही किन्तु तब ऐसा नही था 
सच बहुत याद आते है 
वे पुरसकुं दिन और 
उसकी यादें, मासूम सि…। 
दिल को सहलाती हुई 

No comments:

Post a Comment