Saturday, 22 November 2014

बबचपन 

बचपन का साथी , है मेरा गांव 
कल , मई अपने बचपन के गांव गयी थी, 
उन राहों से गुजरते जो अनुभूति हो रही थी 
उसे शब्दों में बंधना संभव नही 
बीएस यूँ लग रहा था, 
कितने बरसों पहले , यंहा से मेरे जीवन की यात्रा आरम्भ हुई थी 
बाबूजी के गांव से बुआजी के गांव के बीच मेरा आना जाना लगा रहा था 
वंही रस्ते इ एक मंदिर मिलता था 
मंभाव पंथ का छोटा सा नदिर 
समाज की विविधता को अपने में समेटे , 
गांव का जीवन 
वो, मंदिर मेरी स्मृतिओं में बचा रहा 
कल, बेटे संग उसे देखने निकली 
और वंहा पहुँच कर पल, भर को लगा की 
अपने विगत जीवन में पहुँच गयी हूँ 
जन्हा बुआ जी के संग मई बैलगाड़ी से जाती थी, 
और वो, मंदिर आरतियों से गूंजता होता था 
कितना छोटा सा मंदिर 
किन्तु, आस्था उतनी ही प्राचीन और विराट 
मन को बहुत शांति महसूस होती रही 
क्रमशः 

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