Tuesday, 10 November 2015

 बुआजी के घर की दिवाली क्या खास होती थी वो, ख़ुशी 
आज कहा , फिर भी हमारे साथ बच्चेहो 
इन्ही हमारी ख़ुशी है वो, वक़्त 
आज भी यादों में 
मीठे की तरह घुलता जाता है 

Friday, 6 November 2015

जब भी गांव में फोन पर भाई से बातें करती हूँ माँ हमेशा कहती है 
जागेश्वरी है क्या 
माँ को बहुत तकलीफ है 
कहती है, उठा नही जाता 
बहुत मुस्किल से उठती है 
भीतर कंही सलता है दर्द 
मई माँ का कोई इलाज नही बता सकती बस 
उसकी बातें सुनकर खामोश हो जाती हूँ 
किसी का दोष नहीं है 
सब वक़्त की बात है 
कभी माँ हम ७ बच्चों के लिए तीज-त्यौहार में पकवान बनाती थी 
सबके बिस्तर की चादरें धुलवाती थी आज 
वो , बिस्तर पर फ़टे कपड़ों में सिमटी रहती है 
माँ तुम इतनी उदाश और बेबस कैसे हो गयी हम सब बहन-भाइयों का 
विवाह कर हमारा घर बसने वाली तुम आज इतनी दुःख में क्यों लथड़ी हो ,
माँ। 

Thursday, 5 November 2015

मैंने ऐसी उदासी मौसम में आज महसूस की है 
दिशाएं सूनी लगती है 
पक्षी न जाने कंहा चले गए है 
वाकई, ये एक बेरहम सूखा है 
जो, १९७० के बाद का सबसे भीषण है 

Sunday, 1 November 2015

आँगन की ३०९ पोस्ट की ८७०० pageviews है 
जबकि , बनारस की बयार की १३३० पोस्ट की ७६५४ pageviews है 
ये वाकई आश्चर्यजनक है 
जिस बनारस की बयार को मैंने ज्यादा लिखी 
वो, मेरे आँगन ब्लॉग से पीछे है 
इससे पता चलता है , कि 
जिवंत प्रसंग ज्यादा पढ़े गए 
बधाई , आँगन ब्लॉग को