Friday, 6 November 2015

जब भी गांव में फोन पर भाई से बातें करती हूँ माँ हमेशा कहती है 
जागेश्वरी है क्या 
माँ को बहुत तकलीफ है 
कहती है, उठा नही जाता 
बहुत मुस्किल से उठती है 
भीतर कंही सलता है दर्द 
मई माँ का कोई इलाज नही बता सकती बस 
उसकी बातें सुनकर खामोश हो जाती हूँ 
किसी का दोष नहीं है 
सब वक़्त की बात है 
कभी माँ हम ७ बच्चों के लिए तीज-त्यौहार में पकवान बनाती थी 
सबके बिस्तर की चादरें धुलवाती थी आज 
वो , बिस्तर पर फ़टे कपड़ों में सिमटी रहती है 
माँ तुम इतनी उदाश और बेबस कैसे हो गयी हम सब बहन-भाइयों का 
विवाह कर हमारा घर बसने वाली तुम आज इतनी दुःख में क्यों लथड़ी हो ,
माँ। 

No comments:

Post a Comment