Sunday, 27 December 2015

आज माँ को मैंने बताई माँ मई ५४ क हो गयी 
माँ  ने नही पता क्या महसूस किया होगा 
वो, तो , अपनी तकलीफ से परेशान रहती है, उसे बहुत ठण्ड लगती है 
मुझे माँ से कहते हुए बुआजी की याद आ गयी, और आवाज रुंध गयी 
एक पल लगा बुआ जी तुम एक पल को मील जाती तो पर 
हम चाहे जो कर ले अपनों से बिछड़ों को नही पा सकते 
जो, चले गए है, हम उन्हें लौटा नही सकते 
इश्लीए जिनके साथ आज है , उनकी परवाह करे 
क्या पता वक़्त के इस तेज़ बहाव में वो, दूर चले गए , हमसे बिछा गए तो, हम उन्हें नही धुंध ढूंढ सकेंगे 
बुआ जी तुम एक पल को आ जाती तो, 
वंही हटा हट्टा का घर होता तो, बुआ जी, हम सब कितनी ख़ुशी से रहते 
मम्मी वंही छोटी सी जागेश्वरी आपके कन्धों पर लदी बिसूरती होती थी 
बुआ जी, और धीरोजा के जाने के बाद मेरे नखरे उठाने वाले अब नही है फिरभी 
जो, मेरे साथ है, मई उन सबका तहेदिल से सम्मान करती हूँ , और सबको बहुत चाहती हूँ 
क्यूंकि, हमारे अपने स्वजन हममे ईश्वर ने प्रदान किये है , हमे प्रभु के उपहारों के लिए उसका शुक्रिया हमेशा दिल से करना चाहिए , आओ, हम उस रा का धन्यवाद के, उसने हमे जो साथी दिए है, उन सको चाहे 
क्यूंकि, एक नियत समय के लिए ही हम साथ है, वरना काल के परवाह में जाने कान्हा जायेंगे 
फिर भी प्रभु से प्रार्थना करते है, की हम सभी साथ रहे , कही हमारे अपने हमसे अलग न हो 

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