Tuesday, 30 July 2013

angan me hoti thi, chameli

वो, बचपन के दिन थे
जब आँगन में होती थी
चमेली की बेल
मोंगरे की झाड़ियाँ
और आम की अमराईयों में
कुहुकती थी कोयल
बड़ी में लगती थी
जामुन अलमस्त गदराई सी
और दरिया में पानी
उछलते बहता था
तब, कितनी मासूमियत
बिछी होती थी
विस्तृत मैदानों में
हवा झूमती- बहती थी
खेतों में खलिहानों में

अभी लिखी ये कविता 

Sunday, 28 July 2013

shyama didi nhi rahi

श्यामा दी को यंहा बलाघात में ही आकर जनि, जबकि वो हमारे गाँव से ही थी . वो, मेरी सहेली शशि की सबसे बड़ी दीदी थी . मेरे जन्म के साल उनका ब्याह हुवा  था . एस आनंद  जीजा जी बताते है . उनके घर मेरा आना-जाना तबसे शुरू हुवा, जब मै पिछली बार बालाघाट में रहती थी .एक दिन अपरान्ह श्यामा दी मेरे घर आ  ई थी , और बोली, की तुझे तेरे जीजा ने बुलाये है . मई गयी, तभी उन दोनों से घरेलु स्नेह-पूरित सम्बन्ध रहे है . वैसे भी श्यामा दी की माँ मेरे बाबूजी को राखी बंधती थी . बाबूजी ने उनके ही नही , गाँव की कितनी शादियों में कन्हर लिए थे . वो वक्त ऐसा था ,जब मेरे पिता व् बुआ के परिवार का बहुत सम्मान रहा है ऽअज भी है  क़िन्तु श्यामा दी से मै पिछले एक माह से अपनी व्यस्तता वश नही मिल सकी . आज ही प्रात भोर के सपने में वो मुझे दिखी, कुछ कह रही थी ंऐ जब वंहा पंहुची, तो उनके जाने के बाद के दुखद निशान ही घर में मिले . आनंद जीजा जी से ज्यादा बातें नही हो सकी . तीसरे दिन के बाद जाकर उनसे बातें होगी, किन्तु श्यामा दी ने जैसे स्वप्न में आकर मुझे उनके जाने की बात कही , उससे यंही समझ में आता है, कि ये दुनिया किसी और ही परा शक्ति से चलती है. श्यामा दी , आप हमे बहुत यादआओगी 

Tuesday, 16 July 2013

smrti ke angan me

बहुत सा लिखना है , किन्तु आज नही 

Sunday, 7 July 2013

meri asflta

मै  जानती हूँ ,कि मै  बेहद असफल हूँ ,किन्तु मै अपनी सफलता के लिए क्या कर लूँ . आखिर मेरे पास साधन व् धन दोनों ही सिमित है , यंहा तक कि , मै लिखने वालों से अरसे से नही मिली हूँ . ये मेरी इसी सम्श्यायें  है , जिनसे मुझे रूबरू होना है. मै  अति पिछड़े इलाके में हूँ , जन्हा लोग लिखने का कोई मतलब नही जानते . मैंने हमेशा, यंही बताना चाहा है, की लिखने के लिए आप अपना सब कुछ होम कर देते है, बदले में आपको कुछ नही मिलता . एक वक्त के बाद, आप  इतना निराश हो सकते है, की आपको म्रत्यु तुल्य कस्त होता है .दुःख तब कई गुना बढ़ जाता है, जब आप ये पाते है, की आपने लिखने की खातिर अपने बेटे का जीवन भी दुखों से भर दिया है. ये सारे दुःख आपकी असफलता की कसक को बढ़ाते है. मुश्किल तब होती है, जब आप नही बता सकते की, ये दुनिया इतनी निर्मम है, की यंहा कोई आपका अपना नही होता .क्या कहूँ, इससे ज्यादा ......की कभी अपनी बात कहने का साहस नही हुवा, तो चुपचाप सहना ही सिखा . किसी के आगे रोना, या गिडगिडाना , ये स्वाभाव नही रहा , यंहा तक की, किसी की सहानुभूति पाने की भी इक्षा नही रहीफिर भी मैंने जिंदगी का दमन नही त्यागी , क्यूंकि, अपने उस बेटे के लिए तो मुझे हर हाल में जिन है , जिसने अपने जन्म से लेकर अभी तक मेरे लिए ही अपने जीवन को जिया .लोग उसे असफल कह सकते है, ये उनकी समझ है , क्यूंकि हम जिन हालातों से झुझे है , वो इतने भीषण थे , की आप होते , तो अपना आप खो देते . ये भी बता दू, की मेरी साहित्य या लेखन क्षेत्र में कोई पहचान नही है, जब दस-बीश रचना अस्वीकृत होती है, तब एकछपती है . ये बहुत यन्त्रणा दायक होता है , और क्या बताओं, की इस लेखन ने हजार जिंदगियां ली, तब एक को ख़ुशी नसीब हुयी .