Sunday, 7 July 2013

meri asflta

मै  जानती हूँ ,कि मै  बेहद असफल हूँ ,किन्तु मै अपनी सफलता के लिए क्या कर लूँ . आखिर मेरे पास साधन व् धन दोनों ही सिमित है , यंहा तक कि , मै लिखने वालों से अरसे से नही मिली हूँ . ये मेरी इसी सम्श्यायें  है , जिनसे मुझे रूबरू होना है. मै  अति पिछड़े इलाके में हूँ , जन्हा लोग लिखने का कोई मतलब नही जानते . मैंने हमेशा, यंही बताना चाहा है, की लिखने के लिए आप अपना सब कुछ होम कर देते है, बदले में आपको कुछ नही मिलता . एक वक्त के बाद, आप  इतना निराश हो सकते है, की आपको म्रत्यु तुल्य कस्त होता है .दुःख तब कई गुना बढ़ जाता है, जब आप ये पाते है, की आपने लिखने की खातिर अपने बेटे का जीवन भी दुखों से भर दिया है. ये सारे दुःख आपकी असफलता की कसक को बढ़ाते है. मुश्किल तब होती है, जब आप नही बता सकते की, ये दुनिया इतनी निर्मम है, की यंहा कोई आपका अपना नही होता .क्या कहूँ, इससे ज्यादा ......की कभी अपनी बात कहने का साहस नही हुवा, तो चुपचाप सहना ही सिखा . किसी के आगे रोना, या गिडगिडाना , ये स्वाभाव नही रहा , यंहा तक की, किसी की सहानुभूति पाने की भी इक्षा नही रहीफिर भी मैंने जिंदगी का दमन नही त्यागी , क्यूंकि, अपने उस बेटे के लिए तो मुझे हर हाल में जिन है , जिसने अपने जन्म से लेकर अभी तक मेरे लिए ही अपने जीवन को जिया .लोग उसे असफल कह सकते है, ये उनकी समझ है , क्यूंकि हम जिन हालातों से झुझे है , वो इतने भीषण थे , की आप होते , तो अपना आप खो देते . ये भी बता दू, की मेरी साहित्य या लेखन क्षेत्र में कोई पहचान नही है, जब दस-बीश रचना अस्वीकृत होती है, तब एकछपती है . ये बहुत यन्त्रणा दायक होता है , और क्या बताओं, की इस लेखन ने हजार जिंदगियां ली, तब एक को ख़ुशी नसीब हुयी .

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