वो, बचपन के दिन थे
जब आँगन में होती थी
चमेली की बेल
मोंगरे की झाड़ियाँ
और आम की अमराईयों में
कुहुकती थी कोयल
बड़ी में लगती थी
जामुन अलमस्त गदराई सी
और दरिया में पानी
उछलते बहता था
तब, कितनी मासूमियत
बिछी होती थी
विस्तृत मैदानों में
हवा झूमती- बहती थी
खेतों में खलिहानों में
अभी लिखी ये कविता
जब आँगन में होती थी
चमेली की बेल
मोंगरे की झाड़ियाँ
और आम की अमराईयों में
कुहुकती थी कोयल
बड़ी में लगती थी
जामुन अलमस्त गदराई सी
और दरिया में पानी
उछलते बहता था
तब, कितनी मासूमियत
बिछी होती थी
विस्तृत मैदानों में
हवा झूमती- बहती थी
खेतों में खलिहानों में
अभी लिखी ये कविता
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