श्यामा दी को यंहा बलाघात में ही आकर जनि, जबकि वो हमारे गाँव से ही थी . वो, मेरी सहेली शशि की सबसे बड़ी दीदी थी . मेरे जन्म के साल उनका ब्याह हुवा था . एस आनंद जीजा जी बताते है . उनके घर मेरा आना-जाना तबसे शुरू हुवा, जब मै पिछली बार बालाघाट में रहती थी .एक दिन अपरान्ह श्यामा दी मेरे घर आ ई थी , और बोली, की तुझे तेरे जीजा ने बुलाये है . मई गयी, तभी उन दोनों से घरेलु स्नेह-पूरित सम्बन्ध रहे है . वैसे भी श्यामा दी की माँ मेरे बाबूजी को राखी बंधती थी . बाबूजी ने उनके ही नही , गाँव की कितनी शादियों में कन्हर लिए थे . वो वक्त ऐसा था ,जब मेरे पिता व् बुआ के परिवार का बहुत सम्मान रहा है ऽअज भी है क़िन्तु श्यामा दी से मै पिछले एक माह से अपनी व्यस्तता वश नही मिल सकी . आज ही प्रात भोर के सपने में वो मुझे दिखी, कुछ कह रही थी ंऐ जब वंहा पंहुची, तो उनके जाने के बाद के दुखद निशान ही घर में मिले . आनंद जीजा जी से ज्यादा बातें नही हो सकी . तीसरे दिन के बाद जाकर उनसे बातें होगी, किन्तु श्यामा दी ने जैसे स्वप्न में आकर मुझे उनके जाने की बात कही , उससे यंही समझ में आता है, कि ये दुनिया किसी और ही परा शक्ति से चलती है. श्यामा दी , आप हमे बहुत यादआओगी
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