Thursday, 26 December 2013

माँ बताती है 
कि जिस बरस मई पैदा हुयी थी 
उस वक़त मकरसंक्रांति को, १५ दिन की थी 
माँ ने कैसे जन्म  दिया है 
कैसे हमे पाला पोषा है 
वो, हमारी बड़ी बुआ के यंहा थी 
वंहा उसे मात्र १५ दिन कि जचकी के बाद घर का सारा काम करना होता था 
वो , तो मेथी के कड़वे लड्डू बुआ जी उन्हें खिलाती थी 
माँ को बिना मेवे के मेथी व् गुड के कड़वे लड्डू खाकर पुरे घर का काम  करना होता था 
वो घर भी छोटा नही था एक घर में कई कमरे दालान, सहन होते थे 
वो घर दोहरे तिहरे घरों से मिलकर बना था जंहा एक नही तिन चार आंगन होते थे 
घर कि चाहर दिवारी के भीतर ही उनकी दुनिया होती थी किन्तु, मेरी माँ घर के सारे कम निपटा क्र पैदल ही भगवत कथा सुनने  में लेकर जाती थी मुझे माँ कि गोद में नींद आती, तब माँ भागवत कथा का आनन्द में विभोर होकर कृष्ण भक्ति में डूबकर अपना दुःख भूल जाती थी 

Wednesday, 25 December 2013

माँ 
माँ घर का आला हो गयी 
माँ ने सहे इतने दुःख 
कि ,दर्द का प्याला हो गयी 

Thursday, 19 December 2013

हमारा टौमी 
मई जब उस घर में गयी तो, वंहा नन्हा सा टॉमी अपनी माँ व् बहन लाली के साथ मेरे घर आता, उसे खिलने में मुझे अच्छा लगता था , मेरा बीटा भी उनके बीच अपनी उदासी भूल जाता , जब दोपहर में मई सोती , तो मेरे सर कि और वो अपनी पूंछ करके बैठता, और मेरे सर को पूंछ से सहलाता 
बाद में वह घर से हमे जाना पड़ा 
अब जब उधर से गुजरती हूँ, तो मुझे देखते ही , वो दौड़कर आता है, मुझे देख जोरों से पूंछ हिला क्र स्नेह जताता है , जब रोटी देती हूँ, तो वो अपनी तिन ही टांगों पर उचकता है, व् लहराकर रोटी छीनकर खाता है 
वो, कुत्ता तिन टांगों व् चौथी आधी तंग का , टॉमी है, बहुत ही प्यारा सा पप्पी 

Friday, 13 December 2013

घर में सब कुछ है 
बहुत कुछ है 
पर , माँ बाबूजी नही हो 
तो, क्या घर गाँव , आँगन का 
कोई मतलब होगा 
उनके बिना 

Monday, 9 December 2013

तुम 
तुम जो कहो 
तुम जो चाहो 
तुम जो करो 
वंही , मेरे खुशियों का 
बसेरा है 

Thursday, 5 December 2013

babuji

आज आलोक श्रीवास्तव कि कविता पढ़ी 
बाबूजी बहुत याद आये 
बाबूजी हमेशा कोइना कोई काम करते ही रहते है 
उनके होने से जैसे घर में सहन में 
शीतल छाँव का अहसास होता है 
जैसे कि, हम किसी 
घने छायादार दरख्त के साये में हो 
आज आलोक श्रीवास्तव कि कविता पढ़ी 
बाबूजी बहुत याद आये 
बाबूजी हमेशा कोइना कोई काम करते ही रहते है 
उनके होने से जैसे घर में सहन में 
शीतल छाँव का अहसास होता है 
जैसे कि, हम किसी 
घने छायादार दरख्त के साये में हो 
आज अलोक श्रीवास्तव कि कविता पढ़ी 
बाबूजी बहुत यद् अाये