माँ बताती है
कि जिस बरस मई पैदा हुयी थी
उस वक़त मकरसंक्रांति को, १५ दिन की थी
माँ ने कैसे जन्म दिया है
कैसे हमे पाला पोषा है
वो, हमारी बड़ी बुआ के यंहा थी
वंहा उसे मात्र १५ दिन कि जचकी के बाद घर का सारा काम करना होता था
वो , तो मेथी के कड़वे लड्डू बुआ जी उन्हें खिलाती थी
माँ को बिना मेवे के मेथी व् गुड के कड़वे लड्डू खाकर पुरे घर का काम करना होता था
वो घर भी छोटा नही था एक घर में कई कमरे दालान, सहन होते थे
वो घर दोहरे तिहरे घरों से मिलकर बना था जंहा एक नही तिन चार आंगन होते थे
घर कि चाहर दिवारी के भीतर ही उनकी दुनिया होती थी किन्तु, मेरी माँ घर के सारे कम निपटा क्र पैदल ही भगवत कथा सुनने में लेकर जाती थी मुझे माँ कि गोद में नींद आती, तब माँ भागवत कथा का आनन्द में विभोर होकर कृष्ण भक्ति में डूबकर अपना दुःख भूल जाती थी
कि जिस बरस मई पैदा हुयी थी
उस वक़त मकरसंक्रांति को, १५ दिन की थी
माँ ने कैसे जन्म दिया है
कैसे हमे पाला पोषा है
वो, हमारी बड़ी बुआ के यंहा थी
वंहा उसे मात्र १५ दिन कि जचकी के बाद घर का सारा काम करना होता था
वो , तो मेथी के कड़वे लड्डू बुआ जी उन्हें खिलाती थी
माँ को बिना मेवे के मेथी व् गुड के कड़वे लड्डू खाकर पुरे घर का काम करना होता था
वो घर भी छोटा नही था एक घर में कई कमरे दालान, सहन होते थे
वो घर दोहरे तिहरे घरों से मिलकर बना था जंहा एक नही तिन चार आंगन होते थे
घर कि चाहर दिवारी के भीतर ही उनकी दुनिया होती थी किन्तु, मेरी माँ घर के सारे कम निपटा क्र पैदल ही भगवत कथा सुनने में लेकर जाती थी मुझे माँ कि गोद में नींद आती, तब माँ भागवत कथा का आनन्द में विभोर होकर कृष्ण भक्ति में डूबकर अपना दुःख भूल जाती थी
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