Thursday, 5 December 2013

आज आलोक श्रीवास्तव कि कविता पढ़ी 
बाबूजी बहुत याद आये 
बाबूजी हमेशा कोइना कोई काम करते ही रहते है 
उनके होने से जैसे घर में सहन में 
शीतल छाँव का अहसास होता है 
जैसे कि, हम किसी 
घने छायादार दरख्त के साये में हो 

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