Wednesday, 29 January 2014

ओ आकाश कुसुम 
अपना बचपन तो बहुत याद आता है 
किन्तु तेरा हुड़दंग भी कोई कम नही 
जब तो न बच्ची थी , न ही युवा 
तब तू किशोरी थी 
तेरा वो जोश वो जलवा 
वो, तेरा हंसते खिलखिलाते रहना 
और घर में माँ से डांट खाना 
दादी कि झिड़कियों को तेरा हंसकर हंसी में उढ़ा देना 
और तेरी सखियों के संग गलियों में मटरगस्ती 
वो, गली से झनकती निगाहों पर तेरा मुंह बिचकाना 
फिर सखियों संग सबकी नकल उतरकर उन्हें चिढ़ाना 
कम नही रही तेरी धींगा मस्ती 
किसी उस्तादिनी से ज्यादा ही थी तेरी निर्देश देने कि अदा 
तेरे बिन किसी का दिल नही लगदा 
ये तू कुढ़ी बहुत रही उम्दा 
कंहा कंहा नही भटकी 
कंहा कंहा नही घूमती 
ये तेरी बैटन को तो साडी सारी , गलियां थी झूमती 
तू, अपने ग्रुप कि सरदार थी 
फिर भी तू बहुत अल्हड सुकुमार है 
सच तेरे कारन तो जीवन में बहार है 
क्या फर्क पढ़ता है , कि आज इतवार या सोमवार है 
ये सजनी , तू तो सारे दोस्ती का चंद्रहार है 
तेरा हर क्रम स्वीकार है 
पर इतनी भी दूर मत होना 
कि, ख्वालों में तस्व्वुर ही न आये 
तू, जब जब अपनी महफ़िल रोशन करे 

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