Friday, 26 September 2014

जब भी माँ से फोन पर बातें होती है 
माँ किसी  खाने की इक्षा प्रकट करती है 
 ये बताती है , की उससे घर में कोई बात तक नही करता 
 तो,अच्छा नही लगता 
माँ ने तो सबके लिए सब  कुछ किया 
जब उसने सब बच्चों के लिए   
सबका लालन पालन लड़ पीयर प्यार  थी 
आज उसकी जो 
 टीआरएस आता है है 
७ बच्चों की माँ को बोलने  तरसना पड़ता है 
माँ तुम्हारे पास जा भी  
मई कंही से भी स्वंत्र नही हु 
तुम जब बीमार नही थी 
हमारे घर तक आ भी जाती थी 
जबसे परबस हुई हो  ही पड़े रहना 
  है 
फिर  तुम्हे भजन गेट देखने का मन होता है 
मन होता है, की 
तुम्हे तुम्हारे पसंद का  पकाकर खिलाऊ 

Tuesday, 23 September 2014

हिन्दुओं को सांकेतिक चीजें करना अच्छा लगता है
आज पितृ मोक्ष अमावस है
और सब अपने पितृ देव को तर्पण करते है
किंतु, कितने है
जो, जीते जी उन्हें तृप्त कर सके
कई बार कुछ पितृ जीते जी संतान को तरस भी देते है
किन्तु, सब ये सोचते है की सिर्फ बच्चे तरस दे रहे है
ऐसा हमेशा नही होता
रिश्ते हमेशा नत की रस्सी पर चलने जैसा  करतब होते है 

Monday, 15 September 2014

अपना बचपन
अपना बचपन बहुत याद आता है 
सीधा सदा सा 
भोला सा बचपन वो, बुआ जी का आँगन 
और वंहा पर  हमारा प्रवास 
ये नही पता था ,
की खेलते खेलते मुझे वंहा का सब कुछ 
छीन जायेगा 
और अपना प्यारा बसेरा छोड़कर 
मुझे वंहा से जाना होगा आज भी मन में 
उस प्रवास से दूर हो जाने की पीड़ा 
मेरे ह्रदय में कसकती है 
वो, बहुत प्यारे दिन थे मई बुआ जी के यंहा बहुत मजे में 
रहती थी जब हम अपने बाबूजी के गांव जाते तो बैलगाड़ी से जाते थे और 
तब बहुत अच्छा लगता था, 
रस्ते में मुझे नींद भी आ जाती थी उस नींद की झपकी , 
के लिए मन आज भी त्रस्त है 
तब बड़ी बुआ के यंहा 
श्राद्ध होता था 
सरे सारे जाती समाज वालों का भोज होता था 
फूफा व् बुआ तब 
सबके पांव धोकर उन्हें 
खाने को आमंत्रित करते थे अर्थात जितने भी आगंतुक होते 
सबके पांव दोनों मिलके ढोते थे वो, बेहद प्यारे व् न्यारे दिन थे तब स्टैंडर के लिए 
इतना खर्च नही था 
बहुत सम्पन्नता के बावजूद सादगी से रहते थे 
और एक बार पितृ पक्ष में 
हम सभी अपने जाती वाली बुआ के घर जीमने गए थे सब साथ में लाइन से बैठकर 
पंगत में कहते थे 
और बच्चे व् पुरुष पहले जयंती थे उस दिन की याद है, 
हम सभी अभी खा ही रहे थे 
पंगत चल रही थी की अचानक तेज अंधड़ के साथ 
पानी का बरसना शुरू हुआ था और देखते देखते 
बर्फ के ओले गिरने लगे थे ठंडी हवा की सिहरन के साथ 
हम ओले जो, छोटे थे जिन्हे हमारी ग्रामीण भाषा में 
गार्पित गार्पित गार्पित 
ऐसा कुछ कहते थे हमने उठकर मुख में डेल थे हाथों में ठंडा अहसास, रोमांचित होते हुए 
वो, सिहरन 
आज भी याद है 
अब, न तो 
वो, बचपन है, न ही वो लोग 
जाने कहा चले गए सबके सब जब याद करो तो, 
उनकी आवाजे कान में गूंजती है , बीएस 

Thursday, 11 September 2014

ये जिंदगी
ये जिंदगी उधर में नही मिलती 
हम जो कल थे, 
वो, आज नही है 
हम खुद को मेन्टेन तब करेंगे 
जब हमारी जेब में पैसा हो 
हम कल, क्या होंगे एक अनिश्चितता रहती है प्रति पल वो डरती है 
तभी हम ईश्वर की  जाते है 
और मांगते है की 
म्हे सलामत रखे, उपरवाला 
हमारे स्वप्न, हमारे आभाष 
हमारे  गुजरते है साथ व् साथी भी 
हालत के अनुसार बदलते है 
हम जब फर्ज निभाते है 
तभी दूसरे हमारे उप्र ज्यादा तोहमत  लगते है 

Tuesday, 2 September 2014

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