अपना बचपन
अपना बचपन बहुत याद आता है
सीधा सदा सा
भोला सा बचपन वो, बुआ जी का आँगन
और वंहा पर हमारा प्रवास
ये नही पता था ,
की खेलते खेलते मुझे वंहा का सब कुछ
छीन जायेगा
और अपना प्यारा बसेरा छोड़कर
मुझे वंहा से जाना होगा आज भी मन में
उस प्रवास से दूर हो जाने की पीड़ा
मेरे ह्रदय में कसकती है
वो, बहुत प्यारे दिन थे मई बुआ जी के यंहा बहुत मजे में
रहती थी जब हम अपने बाबूजी के गांव जाते तो बैलगाड़ी से जाते थे और
तब बहुत अच्छा लगता था,
रस्ते में मुझे नींद भी आ जाती थी उस नींद की झपकी ,
के लिए मन आज भी त्रस्त है
तब बड़ी बुआ के यंहा
श्राद्ध होता था
सरे सारे जाती समाज वालों का भोज होता था
फूफा व् बुआ तब
सबके पांव धोकर उन्हें
खाने को आमंत्रित करते थे अर्थात जितने भी आगंतुक होते
सबके पांव दोनों मिलके ढोते थे वो, बेहद प्यारे व् न्यारे दिन थे तब स्टैंडर के लिए
इतना खर्च नही था
बहुत सम्पन्नता के बावजूद सादगी से रहते थे
और एक बार पितृ पक्ष में
हम सभी अपने जाती वाली बुआ के घर जीमने गए थे सब साथ में लाइन से बैठकर
पंगत में कहते थे
और बच्चे व् पुरुष पहले जयंती थे उस दिन की याद है,
हम सभी अभी खा ही रहे थे
पंगत चल रही थी की अचानक तेज अंधड़ के साथ
पानी का बरसना शुरू हुआ था और देखते देखते
बर्फ के ओले गिरने लगे थे ठंडी हवा की सिहरन के साथ
हम ओले जो, छोटे थे जिन्हे हमारी ग्रामीण भाषा में
गार्पित गार्पित गार्पित
ऐसा कुछ कहते थे हमने उठकर मुख में डेल थे हाथों में ठंडा अहसास, रोमांचित होते हुए
वो, सिहरन
आज भी याद है
अब, न तो
वो, बचपन है, न ही वो लोग
जाने कहा चले गए सबके सब जब याद करो तो,
उनकी आवाजे कान में गूंजती है , बीएस
अपना बचपन बहुत याद आता है
सीधा सदा सा
भोला सा बचपन वो, बुआ जी का आँगन
और वंहा पर हमारा प्रवास
ये नही पता था ,
की खेलते खेलते मुझे वंहा का सब कुछ
छीन जायेगा
और अपना प्यारा बसेरा छोड़कर
मुझे वंहा से जाना होगा आज भी मन में
उस प्रवास से दूर हो जाने की पीड़ा
मेरे ह्रदय में कसकती है
वो, बहुत प्यारे दिन थे मई बुआ जी के यंहा बहुत मजे में
रहती थी जब हम अपने बाबूजी के गांव जाते तो बैलगाड़ी से जाते थे और
तब बहुत अच्छा लगता था,
रस्ते में मुझे नींद भी आ जाती थी उस नींद की झपकी ,
के लिए मन आज भी त्रस्त है
तब बड़ी बुआ के यंहा
श्राद्ध होता था
सरे सारे जाती समाज वालों का भोज होता था
फूफा व् बुआ तब
सबके पांव धोकर उन्हें
खाने को आमंत्रित करते थे अर्थात जितने भी आगंतुक होते
सबके पांव दोनों मिलके ढोते थे वो, बेहद प्यारे व् न्यारे दिन थे तब स्टैंडर के लिए
इतना खर्च नही था
बहुत सम्पन्नता के बावजूद सादगी से रहते थे
और एक बार पितृ पक्ष में
हम सभी अपने जाती वाली बुआ के घर जीमने गए थे सब साथ में लाइन से बैठकर
पंगत में कहते थे
और बच्चे व् पुरुष पहले जयंती थे उस दिन की याद है,
हम सभी अभी खा ही रहे थे
पंगत चल रही थी की अचानक तेज अंधड़ के साथ
पानी का बरसना शुरू हुआ था और देखते देखते
बर्फ के ओले गिरने लगे थे ठंडी हवा की सिहरन के साथ
हम ओले जो, छोटे थे जिन्हे हमारी ग्रामीण भाषा में
गार्पित गार्पित गार्पित
ऐसा कुछ कहते थे हमने उठकर मुख में डेल थे हाथों में ठंडा अहसास, रोमांचित होते हुए
वो, सिहरन
आज भी याद है
अब, न तो
वो, बचपन है, न ही वो लोग
जाने कहा चले गए सबके सब जब याद करो तो,
उनकी आवाजे कान में गूंजती है , बीएस
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