नही होते , सरकारी काम जल्दी से , रोज तहसील जाती हूँ , और वंहा काम कम नही होते किन्तु वंहा जेल के सामने एक पगली को जिन्दा-लाश बनी , जीर्ण हालत में देखती हूँ, तो रूह कांप जाती है सभी के घर में लडकियाँ है , सोचती हूँ, क्या , यंहा के majistrate व् स्प को, पुलिस वालों को, या जिला पंचायत वालों को बदमाशों द्वारा लुटी जा रही , वो पगली नही दिखती। मुझे उसे देखने के बाद सर में दर्द उठता है , कोई कम किये लौट आती हूँ , बहुत डर लगता है ,जाने क्यूँ एस लगता है, जैसे वो हमारी त्रासदी है , अपना ही दुःख है , मै उदाश हो जाती हूँ। बेटे के साथ होकर भी , मुझे दिलासा नही महसूस होती , लगता है ,मै जिस शहर में रह रही हूँ, वंहा कोई भी सदाचारी व् दयालु नही है , जो उस अनाथ बच्ची पर दया करता
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