Thursday, 29 August 2013

tej ho rahi h, barish

इस बरस बारिश ऐसे हुयी है , जैसे बचपन के दिनों में होती थी , सारा अषाढ़ बरसा है , जिस दिन से ये लगा है,एक दिन भी बरसात नही थमी है।   यंहा बलाघात में अबतक, 1400 mm से ज्यादा बरस चुकी है।
वो बचपन के दिन, भी ऐसे ही बरसते होते थे,जब से धुल भरी आंधी के आमों का सीजन जाता था, बरसात शुरू होती थी , तो खेती केकाम भी चलते।  वो एक अलग ही दौर था , सम्पन्नता का वक्त,घर में कामवालियों व् नौकरों का हुजूम होता था।  तब सबको धान देते थे , परहा  के  लिए , वो सब कामवालियां आकर लेजाती , कितने दिन धान गिनाई का कम उपर वाले ढाबे में होता था।
बुआ जी के घर के वो दिन, जो मेरी यादों में है , वो बहुत ही मधुर स्म्रतियों से भरे है, स्नेहिल माहौल में रहते थे , बुआ जी के बहुत बड़े घर में मई उनके साथ रहती , किन्तु डर नही लगता था।  तब, मई ममता के संग , उस बरस स्कूल से, जो बुआ जी के घर के पीछे था, boys स्कूल से मैंने कई क्यारियां लाकर लगाई थी , बुआ जी के घर के पिछवाड़े के आँगन में , और वो सब लहक उठी थी, मई छठवीं कक्षा में गयी थी , नही जानती थी, की बुआ जी, का घर उस बरस छुट जाने वाला है।
सच बहुत ही दुःख होता है ,उस बिछुड़ने के दर्द को आज भी भीतर जीवित पाती  हूँ। मै  तब संध्या में पुजारी जी के साथ , जाती थी, हमारे घर के मन्दिर में आरती करने, वो मन्दिर फूफाजी ने बनाये थे, ममता के घर के सामने ही था , तो ममता भी आ जाती थी।  वो कितना सुखद समय था , लगता था, जैसे वो दिन हमेशा एक जैसे ही रहेंगे। किन्तु, वो बीत  गये
बुआ जी जब बारिश में अपने खेतों में परहा लगवाने जाती तो , वंहा जाने के लिए , घुटनों से उपर पानी से गुजरना होता, क्योंकि, जो रास्ता होता , वो नाले में बदल जाता था , मई दोपहर को खाने के लिए घरआती , तो घर में बुआ जी के नही रहने पर , रखु बाई आ जाती, जो एक विधवा पडोषण थी, और सामने ही रहती थी, किन्तु, घर दूर ही होते थे , क्योंकि, हमारा घर इतना विस्तृत था , की दुसरे घरों की दुरी ज्यादा ही लगती थी , बाद में मेरे न रहने पर बुआ इ ने बाजु की खाली  जमीं बेच दी ,ताकि, उन्हें पड़ोश नजदीक महसूस हो।  मै उस बरस अपने खेलों व् पढ़ाई में ही मग्न थी , नही मालूम था, की कुछ ऐसा घटित हो जायेगा , की बुआ जी का घर व् साथ छुट जायेगा , व् उनका जीवन फिरसे घोर दुखों से भर जायेगा।
मेरे बुआ जी के पास जाने के पहले , वो अपने इकलौते बेटे को, पति को, व् अपनी नन्द को खो चुकी थी, मेरे आने के साल गर्मी उनके पास रहने वाली उनकी सौत भी गुजर गयी थी। घर में रह्श्यम्यी   विषाद की छाया पड़  गयी थी।  वो उदाशी का साल था, मैंने जिसे अपनी उम्र के ११ वें बरस लगते ही झेला , वो दुःख था, बुआ जी के घर से अपने बाउजी के घर लौटने का , मेरे लिए तो, वन्ही मेरा घर था।
आजतक, इस उम्र में भी यंही लगता है , की बुआ जी का घर ही, मेरा घर था, उसके बाद तो, बस मै प्रवाशी ही रही हूँ ,यंहा तक की अपने घर में भी यंही लगता है , की मै यंहा किसी के कम से हूँ, जबकि बुआ जी के घर लगता था, की मै वंहा अपनी सम्पूर्ण खुशियों के साथ हूँ
आज बहुत तेज बारिश और कैफ़े में भीड़ के बिच इतना ही लिख सकी हूँ , कल बतौंगी, वो घर के अहसास , जन्हा मै घुल मिल गयी थी , जो मेरे भीतर आज भी अपने स्पंदन के साथ जिन्दा है 

Tuesday, 27 August 2013

ho rahi hai, bhadon ki barish

आज जब भादो माह की सप्तमी में अचानक ही , झमाझम बारिश होने लगी है , मुझे बुआ जी के घर में बिताये , वो दिन याद  आ रहे है , जब लगता था, की जिंदगी बस यंही है , सोच भी नही सकती  थी, की कभी वंहा से जाना होगा।  बुआ जी के उस बड़े से घर में बारिश का संगीत गूंजा करता था।  ओर्नियोन के छप्परों से गिरते पानी का संगीत मन में समा जाता था।  व् स्कूल जाते हुए वो दिन बहुत प्यार से गुजरते थे।  मेरी सहेली ममता के साथ स्कूल से लौट क्र, हम दोनों अपने खेल में खो जाते थे।  वो गाँव की , क्या करूं, तेरा 

Wednesday, 21 August 2013

lagi re...

 पता है ,उस दिन के बाद ममता से मेरी कट्टी  थी ,ममता मुझे मारने की धमकी देती , और मै उससे डर कर , उसके घर के सामने से लुकते - छिपते जाती थी , स्कूल।  ऐसे ही माह निकल गया था , तभी रक्षा-बंधन आया , उसके दुसरे दिन, भुजरिया थी, बस साँझ के समय  मै बुआजी के साथ , सामने सबसे सबसे भुजलिया लेने बैठी थी , कि ममता अपने भैया के संग आयी , बुआजी के साथ मुझे भी भुजली देकर नमस्ते की, और हमारी  पहली व् आखिरी लड़ाई का अंत हो गया , फिर हम कभी नही झगडे , लड़ाई का कोई  था।  हम  अच्छी सहेलियां थी , की जबतक मै बुआ के गाँव से लौट नही गयी , हम साथ साथ ही रहे। किन्तु जब मै अकस्मात वंहा से आ गयी, तो बुआ के साथ ही, ममता पर भी बहुत बुरी बीती , ये बेहद बहुत नाजुक घड़ी थी , मेरा बुआ के घर से लौटना , क्यों हुआ , ये अगले अंक मे…। 

Wednesday, 7 August 2013

mere vatan

मेरा मन मेरा तन
सब तुझे अर्पण
मेरे वतन , मेरे वतन
कर  दूँ, तुझ पर
न्यौछावर प्राण
तुझसे ही मेरी
आन, बान औ शान
तुझे समर्पित
मेरा जीवन
ओ मेरे वतन
तू ही मेरा चमन
मेरा गगन
मेरा उपवन
तुझमे समाई
मेरी धड़कन
ये मेरे वतन
मेरे वतन
तुझको नमन
मेरे वतन
जोगेश्वरी 

Sunday, 4 August 2013

meri bachpan ki saheli, mamta

वो ममता है, मेरे बचपन की सहेली , अब जाने कंहा है, ये जानती हु, की जन्हा भी होगी खुश होगी।
हम दोनों इतनी पक्की सहेली थी, की हमारा नाम भी साथ में लेते थे, ममता जागेश्वरी ,यदि कंही मई दिखती, तो गाँव में मुझसे उसे पूछते, यदि वो दिखती तो, मुझे पूछते थे।  मई बुआ जी के घर रहती थी , तभी वो पहली से मेरी सहेली बन गयी थी।  हम साथ स्कूल जाते , कैसे? पहले मई उसके घर जाती , फिर हम दोनों अपना बैग लेके स्कूल तक दौड़ते जाते।  धीमे नही चलते थे, लौटते वक्त भी दौड़ते आते।  यंही नही जब भी गणेश जी व् दुर्गा जी के मेले जाते , इतने जोरों से दौड़ते, जैसे हमारे पीछे कोई चोर डाकू लगे हो।  हमारे खिलौने तो, हम एक साथ, एक बड़े डलिया में रखते, वो हम,से उठता नही तो, उसमे रस्सी बांध उसे दोनों मिलके खींचते। वो डलिया कुछ दिनों मेरे घर होता , तो कुछ दिनों उसके घर होता।
किन्तु, एक दिन हमारी दोस्ती में दरार आ गयी, वो भी किसी झगडे से नही , वरना हालत की वजह से। हमारे स्कूल में उन दिनों sesson के शुरू में दीवालों में डामर लगा रहे थे , वन्ही हम दोनों दीवाल से लगकर इसे ही खड़े थे, कि वो डामर ममता की फ्राक में लग गया, बीएस ममता को गुस्सा आ गया की, मैंने ही उसे डामर लगा दी, जबकि वो खुद दीवाल से लग गयी, और उसकी मामाजी की दी , प्रिय फ्राक भर गयी, डामर से अपनी favrit फ्राक को भरी देख, उसने मुझ पर ही दोष लगा दिया।  और मुझे मरने की धमकी दे दी।  फिर मै अपने मोहल्ले के साइड की लडकियों के बीच छिप के उसके घर के सामने से जाती, इस डर से, की वो मुझे मारेगी, और वो गुस्से से मुझे जाते देखती।
शेष कल 

Thursday, 1 August 2013

vnha, jakr darti hu

 नही होते  , सरकारी काम जल्दी से , रोज तहसील जाती हूँ , और वंहा काम कम नही होते किन्तु वंहा जेल के सामने एक पगली को जिन्दा-लाश बनी , जीर्ण हालत में देखती हूँ, तो रूह कांप जाती है सभी के घर में लडकियाँ है  , सोचती हूँ, क्या , यंहा के majistrate  व् स्प को, पुलिस वालों को, या जिला पंचायत वालों को  बदमाशों द्वारा लुटी जा रही , वो पगली नही दिखती।  मुझे उसे देखने के बाद सर में दर्द उठता है , कोई कम किये  लौट आती हूँ , बहुत डर लगता है ,जाने क्यूँ एस लगता है, जैसे वो हमारी त्रासदी है , अपना ही दुःख है , मै  उदाश हो जाती हूँ। बेटे के साथ होकर भी , मुझे दिलासा नही महसूस होती , लगता है ,मै जिस शहर में रह रही हूँ, वंहा कोई भी सदाचारी व् दयालु नही है , जो उस अनाथ बच्ची        पर दया करता