इस बरस बारिश ऐसे हुयी है , जैसे बचपन के दिनों में होती थी , सारा अषाढ़ बरसा है , जिस दिन से ये लगा है,एक दिन भी बरसात नही थमी है। यंहा बलाघात में अबतक, 1400 mm से ज्यादा बरस चुकी है।
वो बचपन के दिन, भी ऐसे ही बरसते होते थे,जब से धुल भरी आंधी के आमों का सीजन जाता था, बरसात शुरू होती थी , तो खेती केकाम भी चलते। वो एक अलग ही दौर था , सम्पन्नता का वक्त,घर में कामवालियों व् नौकरों का हुजूम होता था। तब सबको धान देते थे , परहा के लिए , वो सब कामवालियां आकर लेजाती , कितने दिन धान गिनाई का कम उपर वाले ढाबे में होता था।
बुआ जी के घर के वो दिन, जो मेरी यादों में है , वो बहुत ही मधुर स्म्रतियों से भरे है, स्नेहिल माहौल में रहते थे , बुआ जी के बहुत बड़े घर में मई उनके साथ रहती , किन्तु डर नही लगता था। तब, मई ममता के संग , उस बरस स्कूल से, जो बुआ जी के घर के पीछे था, boys स्कूल से मैंने कई क्यारियां लाकर लगाई थी , बुआ जी के घर के पिछवाड़े के आँगन में , और वो सब लहक उठी थी, मई छठवीं कक्षा में गयी थी , नही जानती थी, की बुआ जी, का घर उस बरस छुट जाने वाला है।
सच बहुत ही दुःख होता है ,उस बिछुड़ने के दर्द को आज भी भीतर जीवित पाती हूँ। मै तब संध्या में पुजारी जी के साथ , जाती थी, हमारे घर के मन्दिर में आरती करने, वो मन्दिर फूफाजी ने बनाये थे, ममता के घर के सामने ही था , तो ममता भी आ जाती थी। वो कितना सुखद समय था , लगता था, जैसे वो दिन हमेशा एक जैसे ही रहेंगे। किन्तु, वो बीत गये
बुआ जी जब बारिश में अपने खेतों में परहा लगवाने जाती तो , वंहा जाने के लिए , घुटनों से उपर पानी से गुजरना होता, क्योंकि, जो रास्ता होता , वो नाले में बदल जाता था , मई दोपहर को खाने के लिए घरआती , तो घर में बुआ जी के नही रहने पर , रखु बाई आ जाती, जो एक विधवा पडोषण थी, और सामने ही रहती थी, किन्तु, घर दूर ही होते थे , क्योंकि, हमारा घर इतना विस्तृत था , की दुसरे घरों की दुरी ज्यादा ही लगती थी , बाद में मेरे न रहने पर बुआ इ ने बाजु की खाली जमीं बेच दी ,ताकि, उन्हें पड़ोश नजदीक महसूस हो। मै उस बरस अपने खेलों व् पढ़ाई में ही मग्न थी , नही मालूम था, की कुछ ऐसा घटित हो जायेगा , की बुआ जी का घर व् साथ छुट जायेगा , व् उनका जीवन फिरसे घोर दुखों से भर जायेगा।
मेरे बुआ जी के पास जाने के पहले , वो अपने इकलौते बेटे को, पति को, व् अपनी नन्द को खो चुकी थी, मेरे आने के साल गर्मी उनके पास रहने वाली उनकी सौत भी गुजर गयी थी। घर में रह्श्यम्यी विषाद की छाया पड़ गयी थी। वो उदाशी का साल था, मैंने जिसे अपनी उम्र के ११ वें बरस लगते ही झेला , वो दुःख था, बुआ जी के घर से अपने बाउजी के घर लौटने का , मेरे लिए तो, वन्ही मेरा घर था।
आजतक, इस उम्र में भी यंही लगता है , की बुआ जी का घर ही, मेरा घर था, उसके बाद तो, बस मै प्रवाशी ही रही हूँ ,यंहा तक की अपने घर में भी यंही लगता है , की मै यंहा किसी के कम से हूँ, जबकि बुआ जी के घर लगता था, की मै वंहा अपनी सम्पूर्ण खुशियों के साथ हूँ
आज बहुत तेज बारिश और कैफ़े में भीड़ के बिच इतना ही लिख सकी हूँ , कल बतौंगी, वो घर के अहसास , जन्हा मै घुल मिल गयी थी , जो मेरे भीतर आज भी अपने स्पंदन के साथ जिन्दा है
वो बचपन के दिन, भी ऐसे ही बरसते होते थे,जब से धुल भरी आंधी के आमों का सीजन जाता था, बरसात शुरू होती थी , तो खेती केकाम भी चलते। वो एक अलग ही दौर था , सम्पन्नता का वक्त,घर में कामवालियों व् नौकरों का हुजूम होता था। तब सबको धान देते थे , परहा के लिए , वो सब कामवालियां आकर लेजाती , कितने दिन धान गिनाई का कम उपर वाले ढाबे में होता था।
बुआ जी के घर के वो दिन, जो मेरी यादों में है , वो बहुत ही मधुर स्म्रतियों से भरे है, स्नेहिल माहौल में रहते थे , बुआ जी के बहुत बड़े घर में मई उनके साथ रहती , किन्तु डर नही लगता था। तब, मई ममता के संग , उस बरस स्कूल से, जो बुआ जी के घर के पीछे था, boys स्कूल से मैंने कई क्यारियां लाकर लगाई थी , बुआ जी के घर के पिछवाड़े के आँगन में , और वो सब लहक उठी थी, मई छठवीं कक्षा में गयी थी , नही जानती थी, की बुआ जी, का घर उस बरस छुट जाने वाला है।
सच बहुत ही दुःख होता है ,उस बिछुड़ने के दर्द को आज भी भीतर जीवित पाती हूँ। मै तब संध्या में पुजारी जी के साथ , जाती थी, हमारे घर के मन्दिर में आरती करने, वो मन्दिर फूफाजी ने बनाये थे, ममता के घर के सामने ही था , तो ममता भी आ जाती थी। वो कितना सुखद समय था , लगता था, जैसे वो दिन हमेशा एक जैसे ही रहेंगे। किन्तु, वो बीत गये
बुआ जी जब बारिश में अपने खेतों में परहा लगवाने जाती तो , वंहा जाने के लिए , घुटनों से उपर पानी से गुजरना होता, क्योंकि, जो रास्ता होता , वो नाले में बदल जाता था , मई दोपहर को खाने के लिए घरआती , तो घर में बुआ जी के नही रहने पर , रखु बाई आ जाती, जो एक विधवा पडोषण थी, और सामने ही रहती थी, किन्तु, घर दूर ही होते थे , क्योंकि, हमारा घर इतना विस्तृत था , की दुसरे घरों की दुरी ज्यादा ही लगती थी , बाद में मेरे न रहने पर बुआ इ ने बाजु की खाली जमीं बेच दी ,ताकि, उन्हें पड़ोश नजदीक महसूस हो। मै उस बरस अपने खेलों व् पढ़ाई में ही मग्न थी , नही मालूम था, की कुछ ऐसा घटित हो जायेगा , की बुआ जी का घर व् साथ छुट जायेगा , व् उनका जीवन फिरसे घोर दुखों से भर जायेगा।
मेरे बुआ जी के पास जाने के पहले , वो अपने इकलौते बेटे को, पति को, व् अपनी नन्द को खो चुकी थी, मेरे आने के साल गर्मी उनके पास रहने वाली उनकी सौत भी गुजर गयी थी। घर में रह्श्यम्यी विषाद की छाया पड़ गयी थी। वो उदाशी का साल था, मैंने जिसे अपनी उम्र के ११ वें बरस लगते ही झेला , वो दुःख था, बुआ जी के घर से अपने बाउजी के घर लौटने का , मेरे लिए तो, वन्ही मेरा घर था।
आजतक, इस उम्र में भी यंही लगता है , की बुआ जी का घर ही, मेरा घर था, उसके बाद तो, बस मै प्रवाशी ही रही हूँ ,यंहा तक की अपने घर में भी यंही लगता है , की मै यंहा किसी के कम से हूँ, जबकि बुआ जी के घर लगता था, की मै वंहा अपनी सम्पूर्ण खुशियों के साथ हूँ
आज बहुत तेज बारिश और कैफ़े में भीड़ के बिच इतना ही लिख सकी हूँ , कल बतौंगी, वो घर के अहसास , जन्हा मै घुल मिल गयी थी , जो मेरे भीतर आज भी अपने स्पंदन के साथ जिन्दा है