Sunday, 4 August 2013

meri bachpan ki saheli, mamta

वो ममता है, मेरे बचपन की सहेली , अब जाने कंहा है, ये जानती हु, की जन्हा भी होगी खुश होगी।
हम दोनों इतनी पक्की सहेली थी, की हमारा नाम भी साथ में लेते थे, ममता जागेश्वरी ,यदि कंही मई दिखती, तो गाँव में मुझसे उसे पूछते, यदि वो दिखती तो, मुझे पूछते थे।  मई बुआ जी के घर रहती थी , तभी वो पहली से मेरी सहेली बन गयी थी।  हम साथ स्कूल जाते , कैसे? पहले मई उसके घर जाती , फिर हम दोनों अपना बैग लेके स्कूल तक दौड़ते जाते।  धीमे नही चलते थे, लौटते वक्त भी दौड़ते आते।  यंही नही जब भी गणेश जी व् दुर्गा जी के मेले जाते , इतने जोरों से दौड़ते, जैसे हमारे पीछे कोई चोर डाकू लगे हो।  हमारे खिलौने तो, हम एक साथ, एक बड़े डलिया में रखते, वो हम,से उठता नही तो, उसमे रस्सी बांध उसे दोनों मिलके खींचते। वो डलिया कुछ दिनों मेरे घर होता , तो कुछ दिनों उसके घर होता।
किन्तु, एक दिन हमारी दोस्ती में दरार आ गयी, वो भी किसी झगडे से नही , वरना हालत की वजह से। हमारे स्कूल में उन दिनों sesson के शुरू में दीवालों में डामर लगा रहे थे , वन्ही हम दोनों दीवाल से लगकर इसे ही खड़े थे, कि वो डामर ममता की फ्राक में लग गया, बीएस ममता को गुस्सा आ गया की, मैंने ही उसे डामर लगा दी, जबकि वो खुद दीवाल से लग गयी, और उसकी मामाजी की दी , प्रिय फ्राक भर गयी, डामर से अपनी favrit फ्राक को भरी देख, उसने मुझ पर ही दोष लगा दिया।  और मुझे मरने की धमकी दे दी।  फिर मै अपने मोहल्ले के साइड की लडकियों के बीच छिप के उसके घर के सामने से जाती, इस डर से, की वो मुझे मारेगी, और वो गुस्से से मुझे जाते देखती।
शेष कल 

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