Wednesday, 4 June 2014

ये पु 
ये ऊओ ये राममंदिर 
मई एक एक दिन गिनती हूँ 
कभी चैन से नही रहती 
अब गांव जाउंगी 
ये सोचके भी उत्सुक हूँ सब कुछ नया हो जैसे 
माँ  मिलना 
माँ की ध्यानमग्न सूरत को याद करती 
आयशा नन्ही बच्ची दो दिन नही थी 
आज लौटी 
मेरी गॉड में खेलती रही 
और दिवालके स्विच को जलाने 
उसे उप्र उठती मई 
खुश होती रही 
मई इतने दूर आकर 
शायद आयशा की स्मृति को साथ ले जाउंगी आयशा 
एक डेढ़ बरस की बच्ची 
उसकी नानी दुबई जाएगी 
और मई गांव 
उसके नन्हे से दिमाग को नही समझेगा 
की हम कहा चले गए 
बच्चे तभी तो सब कुछ भूल जाते है 

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