Thursday, 31 July 2014

बुआजी सावन में बहुतसे लोक गीत गति थी 
उनके गए गीत मुझे भी याद है 
बताउंगी कभी 

Tuesday, 29 July 2014

गांवों की रवायतें अब बोझ बन गयी है 
महगाई ने सब कुछ सोख लिया है 
जो, जीवन रास था 
 जिंदगी ज्यादा मुश्किल है 
यंहा जिन मुश्किल है 
जीना मुश्किल है 
बहुत हिम्मत करनी होती है 
जिंदगी के लिए 
एक लेखक की कठिनाई तो 
वंही जनता है 
कोई भी लेखक को कुछ देना नही चाहता 

Wednesday, 23 July 2014

गाँवो तक प्रगति नही होती 
बहुओं को दासी ही समझते है 
गांवों में उन्हें मार डालते है 
पुलिस अपनी भूमिका नही निभाती 
क्रूर अपराधी खुले घूमते है 

Monday, 14 July 2014

माँ घर के सहन में बैठी सबकी राह देखती है 
सबको याद करती है 
माँ के जमाने में हम झूले झूलते हुए रेडिओ पर गीत सुनते थे आज माँ हारी थकी, एक जगह बैठी सुनी आँखों से 
सबकी राह देखती है माँ के पांवों में सूजन आ जाती है , कोई उससे नही बोलता 

Saturday, 12 July 2014

 गुरुपूर्णिमा कल थी 
माँ कितनी पूजा पथ किया करती थी 
माँ तब कितनी तेजस्वी लगती थी 
माँ तुझे क्या हो गया 
तुम हमेशा संतो का सत्कार कर आनंदित होती थी 
माँ तुम्हारी तरह हम तो नही हो सके 
माँ तुम्हारी इज्जत भी हम नही कर सके 
माँ तुम्हारे ज्ञान को नही समझ सके 
माँ तुम्हारी तरह परमात्मा को नही भज सके 
माँ तुम इतनी ममतामयी रही 
तुम्हारे ह्रदय में करुणा भरी रही 
तुम ज्ञान के साथ प्रेम को भी मानती रही 
हमेशा मेहमानों का स्वागत करती रही 
तुमने हम सात बहन भाइयों का लालन-पालन ही नही किया 
जबतक बना घर में गौ-पालन होता रहा 
कृषि, खेती की संस्कृति को तुमने जीवित रखा 
माँ तुम महान हो 
तुमने घर में काम करने वालों को भी ममता से रखा 
माँ तुम्हारे संग हमारी भक्ति की धारा चलती रही 
माँ तुम शांति हो तुम्हारा मन सदैव वैराग्य से भरा रहा 
ऐसी भक्ति-भाव रखने वाली 
गुरुओं को मानने वाली माँ को साधुवाद , सत्कार, अभिनन्दन 

Friday, 11 July 2014

Yeh Zindagi Usi Ki Hai - Lata Mangeshkar, Anarkali Song

वो गर्मियों के दिन थे 
वो गर्मियों के दिन थे 
बुआ जी पूरी दोपहरी सफर कर  पहुंची थी 
और घर पहुँचते ही 
उन्होंने दूध की अलमारी से 
दही निकालकर खाया था 
वे जैसे थक सी गयी थी 
बुआ जी अपना दुःख नही बता सकी किसी को 

Thursday, 10 July 2014

याद आता है
जब गर्मी में बुआ जी
हमारे घर थकी हुई आई थी
तो , उन्होंने
रसोई से दही लेकर खाया था वे सफर से थकी थी ये आज समझ में आता है