Saturday, 27 December 2014

माँ
माँ जिसने जन्म दिया 
कितनी मुश्किल भरी जिंदगी थी उसकी 
 सुबह से आज उसे चक्र भी नही बात कर सकी हूँ 
अब, घर जाते ही, माँ से फोन पर बात करूंगी 
मेरा जन्म जब हुआ 
माँ आज भी बताती है की १५ दिन बाद तिल-संक्रात आई थी 
माँ को बुआ जी तब मेथी के कड़वे लड्डू खिलाती थी 
नन्द के घर कोई नखरे नही चलते थे 
जचकी के १५ दिन बाद सब काम करने होते थे 
माँ ने हम ७ बहन-भाइयों को जन्म दिया 
वो, कितने कठिनाई से दूसरों के घर हमे देखती रही होगी 
बड़े घरों में बड़े काम होते है 
माँ को भी पल भर अपने लिए नही मिलता था मुझे 
तब कौन देखता 
बुआ जी मुझे अपने साथ ले गयी थी 
तब, मई डेढ़ बरस की भी नही थी 
 गए है , दिन बिट गए है 
तो, चलूँ, 
माँ से बाटे , ये……। 
मई भी दिन भर से आज थक गयी हूँ 

Saturday, 20 December 2014

मेरे छोटे से शहर में 
जब, दिन-दोपहर को मई बाजार से गुजरती हूँ 
तो, वंहा , एक वृद्धा को 
जो, की अंधी भी है 
मई हमेशा 
उस बेचारी कमजोर बूढी स्त्री को 
दो, तीन थैले हाथों में टाँगे 
एक, हाथ में लकड़ी से टेक लेकर 
झुकी कमर से 
गुजरते देखती हूँ 
वो, हे राम की टेर  लगाती 
लाठी टेकती 
थैलों के बोझको , संभाले 
कैसे गुजरती है 
फिर भी उसे नही है 
किसी से शिकायत 
और वो, नही है 
मतदान का कार्ड 
सच, लोगों के दिल कितने कमजोर है 
काश, जो धर्म पर लड़ते है 
ऐसे बेसहारा वृद्ध स्त्रियों को 
कोई , आश्रय देते 
और मंदिरों व् मजारों पर आ रही 
राशि से 
इन्हे भी खाने मिलता 
ये क्या भीख मांगते 
हमारे समाज को गौरवन्वित करते है 
२ 
एक, जवान स्त्री को देखा 
जो, अस्तव्यस्त हालत में 
पोटली की शक्ल में 
थोड़े से कपडे समेटे 
बेपरवाह सी 
सड़क के चौराहे पर 
बैठी है 
कुछ चकराई सी 
ये सोचती-बुझती 
कि 
वो, अब कहा जाएगी 
इस दुनिया में 
उसका कोई भी तो नही 

Wednesday, 17 December 2014

bnaras ki byar: bnaras ki byar

bnaras ki byar: bnaras ki byar: मैंने कभी बनारस देखा नही ,बस सुना व् पढ़ा करती थी, शरद के नोवेल व् रविन्द्र की कथा में कुछ झलक पाई थी. किन्तु कोई राग नही था, महाभारत के क...

Sunday, 14 December 2014

माँ
माँ सच्ची साधक है 
एक बार मई गर्मी में गयी थी गांव 
तो, आम की अमराई से 
कोयल की कूक सुनाई दे रही थी 
तब, माँ बोली थी 
किसी कवि की मराठी में कविता थी 
जिसका अनुवाद माँ ने बताया था 
की, ये कोयल 
तू क्यों इतना मीठा गाती है 
तेरी मीठी बोली को सुनने वाले यंहा कौन है 
मई माँ की बात का निहितार्थ समझ गयी थी 
माँ ,तुमने कविता के माध्यम से अपनी बात राखी थी 
माँ, सरस्वती तुम्हारे जिन्हा में वास करती है 
तुम कितना जानती हो, जो 
हमे कुछ भी याद नही 
जो, तुम इतना सुंदर कविता कहती हो 

Sunday, 7 December 2014

माँ 
माँ कितने दोहे गाती है 
एक दोहा याद आ रहा है 
जो , माँ कहती थी 
दया धर्म का मूल है , पाप मूल अभिमान 
तुलसी दया ना छोड़िये , जबतक घट में प्राण