Saturday, 20 December 2014

मेरे छोटे से शहर में 
जब, दिन-दोपहर को मई बाजार से गुजरती हूँ 
तो, वंहा , एक वृद्धा को 
जो, की अंधी भी है 
मई हमेशा 
उस बेचारी कमजोर बूढी स्त्री को 
दो, तीन थैले हाथों में टाँगे 
एक, हाथ में लकड़ी से टेक लेकर 
झुकी कमर से 
गुजरते देखती हूँ 
वो, हे राम की टेर  लगाती 
लाठी टेकती 
थैलों के बोझको , संभाले 
कैसे गुजरती है 
फिर भी उसे नही है 
किसी से शिकायत 
और वो, नही है 
मतदान का कार्ड 
सच, लोगों के दिल कितने कमजोर है 
काश, जो धर्म पर लड़ते है 
ऐसे बेसहारा वृद्ध स्त्रियों को 
कोई , आश्रय देते 
और मंदिरों व् मजारों पर आ रही 
राशि से 
इन्हे भी खाने मिलता 
ये क्या भीख मांगते 
हमारे समाज को गौरवन्वित करते है 
२ 
एक, जवान स्त्री को देखा 
जो, अस्तव्यस्त हालत में 
पोटली की शक्ल में 
थोड़े से कपडे समेटे 
बेपरवाह सी 
सड़क के चौराहे पर 
बैठी है 
कुछ चकराई सी 
ये सोचती-बुझती 
कि 
वो, अब कहा जाएगी 
इस दुनिया में 
उसका कोई भी तो नही 

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