बुआ जी के घर बिताये दिन क्या भूलने लगी हूँ, ४० वर्ष पहले यादों का अब क्या महत्व , सब इन्ही कहेंगे, कि आज मई जब वंहा नही, तो यादों में भी क्यों जाती हूँ. और वो घर जन्हा मई और बुआ ही रहते थे. दिन भर मई अपनी कक्षा की पढाई में व् खेलकूद में मग्न रहती थी . और साँझ जब बुआ जी रसोई कर चुकी होती , तो, वे फिर साँझा आरती करती थी. मई भी आरती के वक़्त उनके पास आ जाती, और आरती गाने लगती थी. वह समय आज तक स्मृति में ,कि बहुत शांति होती थी, जिसे नीरवता कहते.
हम आरती गए रहे होते थे
और कोई अंजाना सा भय भी भीतर महसूस होता था, जाने कौन सा साया था, की कई बार गाते हुए भी सिहरन महसूस . शायद बुआ जी की सौत के अचानक मर जाने से मन में डॉ समा गया हो , पर वो कांपती सी आरती की लौ जैसी मई भावना को आज भी महसूस करती हूँ .
हम आरती गए रहे होते थे
और कोई अंजाना सा भय भी भीतर महसूस होता था, जाने कौन सा साया था, की कई बार गाते हुए भी सिहरन महसूस . शायद बुआ जी की सौत के अचानक मर जाने से मन में डॉ समा गया हो , पर वो कांपती सी आरती की लौ जैसी मई भावना को आज भी महसूस करती हूँ .
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