आँगन सभी को
बेहद प्रिय है
न जाने क्यों
वक़्त का पंछी उड़ जाता है
और जीवन भी तेजी से
बिट जाता है
मैंने कितना चाहा , कि
अपनी नई किताब लिखूं
पर परिवार के कामों ने
इजाजत नही दी
अब शायद मई में लिखूं
भारत का इतिहास
वैसा, जैसा मैं पढ़ना चाहती हूँ
बेहद प्रिय है
न जाने क्यों
वक़्त का पंछी उड़ जाता है
और जीवन भी तेजी से
बिट जाता है
मैंने कितना चाहा , कि
अपनी नई किताब लिखूं
पर परिवार के कामों ने
इजाजत नही दी
अब शायद मई में लिखूं
भारत का इतिहास
वैसा, जैसा मैं पढ़ना चाहती हूँ
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