Sunday, 10 May 2015

माँ 
तुम हो नम आँखों का धुंवा 
यादों का है 
कोई  भरा हुआ कुंवा 
जिसे नही झांकता है कोई 
पर माँ 
तुम वो, हो 
जो, उन आवाजों को 
महसूस करती हो 
आज तक 
उदाश आँखों में 
सामने तपती दोपहरी में 
आँगन का उदास कोना 
जैसे कंही सुस्त रहा हो 
सिपहिया पक्षी 
माँ 
तुम नही बनाती हो 
आचार पर 
महसूस करती हो 
उसे कहते हुए 
मेरे चटखारे लेते ओठों को 
माँ 
तुम रोज बुलाती हो , मुझे 
और भोर से उठकर 
तकती हो राह 
माँ 
अलगनी पर 
यूँ ही सूखते 
तुम्हारे उतारे हुए 
बिना धोये कपडे 
हफ्तों हमारी उपेक्षा पर 
हिकारत से पड़े रहते है 
माँ 
क्यों तुम 
हमारे लिए 
दुनिया की 
सबसे बेकार 
गयी गुजरी वास्तु हो 

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