Sunday, 17 May 2015

आज अचानक गांव चली गयी 
बचपन का गांव 
जैसे पीपल की छाँव 
कुछ पुराने पथराए चेहरों पर 
फूटी एक हंसी की किरण 
भींग गया मन 
जैसे हो, झरने की फुहार 
ऐसा था 
रसभीना 
मेरे अपनों का प्यार 
कुछ पल को सब, नतमस्तक थे 
जैसे मई अपने पुराने 
ऐश्वर्या को पा रही थी 
किन्तु वो विगत था 
आज मेरे पास संघर्ष है 
आगत के लिए 
लगी रहहति हूँ 
जी जान से 
फिर भी 
पाकर उस पुराने स्नेह मान को 
मन, भर गया था 
ओजस्वी अभिमान से 

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