Monday, 24 February 2014

नही पता उन दिनों आँखों में कितने स्वप्न रहा करते थे 
आँखे ख्वाब बुना करती थी पर, साथ में उन ख्वाबों को ताबीर करनेवाला 
कोई भी तो हमदम नही रहा , ख्वाब सिर्फ खवाब ही रह गये 

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