एक बसंत वो भी था
जब तू अल्हड हिरनी सी
कूदती फिरती थी सरिता के धरे
सरिता के मतवाले धारों सी
जैसे मस्ती में बहती थी
जिधर से तू निकलती थी
लोगों कि नजरे उठ जाती
और तू उन्हें चिढ़ा क्र कहती
नानू , दू गाल। ……… बेचारे
बेचारे दीवानों कि आहें निकल जाती
जब तू अल्हड हिरनी सी
कूदती फिरती थी सरिता के धरे
सरिता के मतवाले धारों सी
जैसे मस्ती में बहती थी
जिधर से तू निकलती थी
लोगों कि नजरे उठ जाती
और तू उन्हें चिढ़ा क्र कहती
नानू , दू गाल। ……… बेचारे
बेचारे दीवानों कि आहें निकल जाती
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