तब
तब विवाह घर के आँगन में ही होता था घर चाहे जितना बड़ा हो, विवाह अपने घर में अपनों के बिच, अपने मोहल्ले वालों के साथ ही होता था , मंगल कार्यालय में नही। अपने घर को लिपाई पुताई क्र सजाते थे
घर आँगन को स्वच्छ क्र लीपा जाता टहअ.गहअऋकइसअऋइ ये तू बता क्या लिखना है, तुम लिखो , मई देखती हूँ, तुम कहो वो लिखूं , जानती है, तुझे यंहां के रिश्ते निभाना है , इस धरती के खून के नाते निभाना है
ये सुनखी तेरे प्रत्येक ख़ुशी से मई खुश हूँ
तो, विवाह ऐसा नही कि सज संवर लिए वो
वो हल्दी चन्दन उबटन के पहले शुरू होती थी
तेल चढ़ाने कि रस्म
फिर चन्दन व् मंगरमति घर के आँगन में जब मड़वा डाला जाता , मांगरमति लायी जाती
मड़वे पर जामुन व् आम कि पत्तियों कि शंखे डाली जाती , बिच में होता एक, खम्बा , जिसे सजाते थे, पूजा जाता, हल्दी लगते , जिसे भंवर कहते थे
हमारी कलवार जाती के गीत जो कि घर कि बुजुर्ग औरतें गति थी , जब तेल चढ़ता था
डोंगर डोंगर घनी चले , ओ घनी चले , राइ चंपावती टिलिया को तेल
हमारी कृषक संस्कृति का विवाह गीत, बहुत ही मधुर
ये हमारी कलरकलार जाती के टेली होने का भी प्रमाण देता है , कि जो शराब बेचते थे, वो कलवार होते , जो हमारी जाती है, किन्तु वंही साथ में तेल बेचने वाले भी थे , ये कृषि-प्रधान कर्म-शील जातियां थी, जो खेती-बरी के साथ , अपना व्यवसाय भी करती थी , शेष कऌ.......
तब विवाह घर के आँगन में ही होता था घर चाहे जितना बड़ा हो, विवाह अपने घर में अपनों के बिच, अपने मोहल्ले वालों के साथ ही होता था , मंगल कार्यालय में नही। अपने घर को लिपाई पुताई क्र सजाते थे
घर आँगन को स्वच्छ क्र लीपा जाता टहअ.गहअऋकइसअऋइ ये तू बता क्या लिखना है, तुम लिखो , मई देखती हूँ, तुम कहो वो लिखूं , जानती है, तुझे यंहां के रिश्ते निभाना है , इस धरती के खून के नाते निभाना है
ये सुनखी तेरे प्रत्येक ख़ुशी से मई खुश हूँ
तो, विवाह ऐसा नही कि सज संवर लिए वो
वो हल्दी चन्दन उबटन के पहले शुरू होती थी
तेल चढ़ाने कि रस्म
फिर चन्दन व् मंगरमति घर के आँगन में जब मड़वा डाला जाता , मांगरमति लायी जाती
मड़वे पर जामुन व् आम कि पत्तियों कि शंखे डाली जाती , बिच में होता एक, खम्बा , जिसे सजाते थे, पूजा जाता, हल्दी लगते , जिसे भंवर कहते थे
हमारी कलवार जाती के गीत जो कि घर कि बुजुर्ग औरतें गति थी , जब तेल चढ़ता था
डोंगर डोंगर घनी चले , ओ घनी चले , राइ चंपावती टिलिया को तेल
हमारी कृषक संस्कृति का विवाह गीत, बहुत ही मधुर
ये हमारी कलरकलार जाती के टेली होने का भी प्रमाण देता है , कि जो शराब बेचते थे, वो कलवार होते , जो हमारी जाती है, किन्तु वंही साथ में तेल बेचने वाले भी थे , ये कृषि-प्रधान कर्म-शील जातियां थी, जो खेती-बरी के साथ , अपना व्यवसाय भी करती थी , शेष कऌ.......
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