Thursday, 20 February 2014

घर घर घर 
कंहा है, बता दे 
कंहा है ,
वो दाल-चावल कि खुशबु 
बता दे तू 
आज खाकर , राबड़ी 
बचपन को बहुत याद किया 
और वो रोटी पर रखा मक्खन 
और चटनी 
ये यादें है 
बसंत से सनी 
सारा वक़त भूखी रहती हूँ 
मसाले कि गंध सहन नही होती 
कितने दिन हुए 
दाल में घी डालकर रोटी खाये हुए 
सुखी रोटी चबाती हूँ 
और मसाले वाली सब्जी से 
खाने कि इक्छा मर जाती है 
ये माँ ये मेरी तुझे 
लिखी पाती है 
जो, मई किसी को नही बता सकती हूँ 
कंहा मिलेगी,
बुआ जी के हाथ कि रोटी 
तू ही बता 
कंहा मिलेगा दल-चावल 
ये मेरी सफलता कि सजा है 
फिर भी कहती हूँ 
जिंदगी में बहुत मजा है 

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