घर आँगन द्वारे
सब सहेज रखे है
स्मृतियों में
आज लगता है
किसानों कि आत्महत्या को हमारा समाज
कितनी नरदयता से
निर्दयता से अनदेखा करता है
क्या ये सिर्फ राजनीति है
या हमभी किसानों के प्रति
अनजाने ही क्रूर हो गये है
आज विमलेश त्रिपाठी जी कि कविता देखकर यंही लगा कि ये सवाल सबसे पहले आना चाहिए
कि कृषि ही, हमारी संस्कृति है, और कर्म भी
सब सहेज रखे है
स्मृतियों में
आज लगता है
किसानों कि आत्महत्या को हमारा समाज
कितनी नरदयता से
निर्दयता से अनदेखा करता है
क्या ये सिर्फ राजनीति है
या हमभी किसानों के प्रति
अनजाने ही क्रूर हो गये है
आज विमलेश त्रिपाठी जी कि कविता देखकर यंही लगा कि ये सवाल सबसे पहले आना चाहिए
कि कृषि ही, हमारी संस्कृति है, और कर्म भी
aayiye, kheti-kisani ke sarokaron se jude
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