Thursday, 6 February 2014

घर आँगन द्वारे 
सब सहेज रखे है 
स्मृतियों में 
आज लगता है 
किसानों कि आत्महत्या को हमारा समाज 
कितनी नरदयता से 
निर्दयता से अनदेखा करता है 
क्या ये सिर्फ राजनीति है 
या हमभी किसानों के प्रति 
अनजाने ही क्रूर हो गये है 
आज विमलेश त्रिपाठी जी कि कविता देखकर यंही लगा कि ये सवाल सबसे पहले आना चाहिए 
कि कृषि ही, हमारी संस्कृति है, और कर्म भी 

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