Sunday, 28 February 2016

aangan:  आजकल,जाने कितने डॉ डर डरा कर रहते है मुझे घर के ब...

aangan:  आजकल,जाने कितने डॉ डर डरा कर रहते है मुझे घर के ब...:   आजकल,जाने कितने डॉ डर डरा कर रहते है मुझे घर के बाजू में एक माकन बन रहा है वंही हमारे किचन का पानी जाता है, अब उसे बाजु वाले प्लाट से नि...
 आजकल,जाने कितने डॉ डर डरा कर रहते है मुझे घर के बाजू में एक माकन बन रहा है वंही
हमारे किचन का पानी जाता है, अब उसे बाजु वाले प्लाट से निकलना है
बात छोटी सी है, पर घर बनाते समय की गलती है जो मेरी सेहत को घुन जैसी लगी है वो
काम हो जायेगा , पर मैं  सोचती हूँ की जिस दिन ये काम होगा , मई बहुत खुश रहूंगी
 जिंदादिली यंहा आकर फिस्स हो गयी है
वरना खुद को बहुत खुशमिजाज बताती थी
बस इतनी ही मुझमें जिंदादिली थी, ये अब आ गया है
अपनी उदासी से दूसरों को भी परेशान करना, कोई अच्छी बात नही
माँ बेचारी  ,उसे भी फोन नही कर सकी
कभी इधर उधर भागते लगता है,
क्या ये सारे काम महत्व के है
इतना पता है, एक काम होगा तब दूसरा होगा
पहले ये सोचती थी , कि बेटे की शादी जुड़ेगी तो, बहुत हश रहूंगी
पर जो ये नया काम समने आया तो, मन वंही उलझ सा गया
बेटे का विवाह जुड़ने का आनंद भीतर ही दब गया
जो, भी हो एक ख़ुशी हो, और दूसरा काम भी सामने हो तो, कैसा अनुभव करते है
वंही आजकल, मेरे दिल के हालत है 

Friday, 26 February 2016

आँगन के पठनीयता बहुत है इश्लीए इसे रोज लिख रही हूँ कभी
बहुत  लिख  ,जैसे  रही हूँ
क्या  करूँ,अपने  बात और  होती है
 आजकल,इन्ही लगता है
जैसे  चिंता से बिंधा सा रहता है
बता  नही पाती
चलूँ , कल बहुत बारिश हुई  ,लाइट चली गयी थी, देर रात के लिए
वक़्त 

Thursday, 25 February 2016

aangan: अख़बार व् टीवी से मई वंचित रहीतो, पता नहीं चला कि...

aangan: अख़बार व् टीवी से मई वंचित रही
तो, पता नहीं चला कि
...
: अख़बार व् टीवी से मई वंचित रही तो, पता नहीं चला कि एक यूनिवर्सिटी में अफजल गुरु नामक आतंकी की बरसी मनाई गयी ये तो, देशद्रोही को खुला समर्...
अख़बार व् टीवी से मई वंचित रही
तो, पता नहीं चला कि
एक यूनिवर्सिटी में अफजल गुरु नामक आतंकी की बरसी मनाई गयी
ये तो, देशद्रोही को खुला समर्थन था
साथ ही, आँखें दिखने का बहाना कि
जो भी वे करेंगे उन्हें कोई रोक नही सकता
सीना ठोककर , देशद्रोह पर उतारू
ऐसे लोग जिन्हे देश से ज्यादा
उसपार वालों की परवाह
वे किसी आतंकी संगठन से मिले लगे
लगा उन्हें वंहा से फंडिंग मिल रही हो
सोसाइल साइट्स पर भी आँखें दिखा कर
पूरी ढीठता के साथ
अपने देशद्रोह के अजेंडे को
लागु करते हुए
वे छात्र संघ के रहनुमा
जिन्हे कुछ राष्ट्रीय पार्टियों की शाह व् समर्थन मिला हुआ है
ये है, एक देशद्रोही की याद में कल्पने वाले
और, संघ को दुत्कारने
हिन्दुओं को दुर्दुराने वाले
पाक-परास्त
सबके सब है
मस्त
और चाहते है करना
राष्ट्रवादियों को प सत 

aangan: एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँतो,...

aangan: एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँ
तो,...
: एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँ तो, गहन संतुष्टि मिलती है जिंदगी में मैं इसी तरह से व्यस्त रही और घर में अस्त-व्यस्त रही ...
एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँ
तो, गहन संतुष्टि मिलती है
जिंदगी में मैं इसी तरह से व्यस्त रही
और घर में अस्त-व्यस्त रही
आजकल, ब्लॉग लिख कर ख़ुशी महसूस करती हूँ
की, कमसे कम २०-२२ pageview तो होते है
अभी एक लड़की कैफ़े में आई
खुश दिल , खुले दिल की
सारी बातें हंसी में बोलती हुई
मुझे लगा , मैं भी पहले इसी तरह मजाक में बोला करती थी
फिर जीवन में घटना क्रम इस तरह उलझा कि
 रहने लगी
आप गंभीर नही रहते ,
हो जाते है
अपने आप होती है तब्दीली    

Wednesday, 24 February 2016

aangan: जो भारत का इतिहासमई लिखूंगी, मई  से वो, हिन्दुओं...

aangan: जो भारत का इतिहास
मई लिखूंगी, मई  से
 वो, हिन्दुओं...
: जो भारत का इतिहास मई लिखूंगी, मई  से  वो, हिन्दुओं के नज़रिये से होगा मुझे  लगता है हम हिन्दुओं के साथ सबसे ज्यादा अन्याय  किया है इस इ...
जो भारत का इतिहास
मई लिखूंगी, मई  से
 वो, हिन्दुओं के नज़रिये से होगा
मुझे  लगता है हम हिन्दुओं के साथ
सबसे ज्यादा अन्याय  किया है
इस इतिहास का दूसरा नाम होगा
pride of indiya
इसमें विक्रमादित्य , हर्षवर्धन
व् समुद्रगुप्त जैसे सम्राटों को
मैं सबके सामने लाऊंगी
जो, इतिहास हमेशा मुग़ल काल में
सिमट जाता है, उसे
मैं पृथ्वीराज और समुद्रगुप्त  विजय के साथ हर्षवर्धन
व् विक्रमादित्य के स्वर्णयुग के साथ
सबके समक्ष लाऊंगी 

Tuesday, 23 February 2016

 आँगन सभी को
बेहद प्रिय है
न जाने क्यों
वक़्त का पंछी उड़ जाता है
और जीवन भी तेजी से
बिट जाता है
मैंने कितना चाहा , कि
अपनी नई किताब लिखूं
पर परिवार के कामों ने
इजाजत नही दी
अब शायद मई में लिखूं
भारत का इतिहास
वैसा, जैसा मैं पढ़ना चाहती हूँ 

Monday, 22 February 2016

aangan: माँ के बेतहाशा रोनेऔर कराहने के बीचमेरे फोन का ब...

aangan: माँ के बेतहाशा रोने
और कराहने के बीच
मेरे फोन का ब...
: माँ के बेतहाशा रोने और कराहने के बीच मेरे फोन का बैलेंस माँ के लिए एक कामवाली को तलाश रही हूँ जो, गांव में रहकर उसे सहारा दे सके क्यू...
माँ के बेतहाशा रोने
और कराहने के बीच
मेरे फोन का बैलेंस
माँ के लिए
एक कामवाली को तलाश रही हूँ
जो, गांव में रहकर
उसे सहारा दे सके क्यूंकि
अपने अब सहारे के काबिल नही रहे 
जो तुम संग है ,
वो बसंत
जो तुम्हारे साथ नही
वो, संत 
तुम हो तो बसंत है तुम नही तो सब संत है 

ZIKR HOTA HAI JAB QAYAMAT KA - Mukesh - MY LOVE (1970)

Sunday, 21 February 2016

माँ से बात हुई
माँ रोते  हुए बताती है
कि छोटा भाई  नही सुनता
वो, बहुत ज्यादा कमजोर हो गयी है
इन्ही, मेरा भाई
जिसने कभी माँ की सेवा की थी
अब, माँ की तरफ देखता भी नही
बेटे जब बड़े हो जाते है म
माँ से उन्हें एलर्जी हो  जाती है
माँ को डर  लगता है कि
वो, टॉयलेट में गिर जाएगी
तो, कोई उसे नही उठाएगा 

Friday, 19 February 2016

माँ से ल बात हुई , और सब कुछ द्रवित करने वाला था
भाई को भी परेशानी, भाभी के भी सपने चुरचूर कुछ समझ नही आ रहा
माँ का पांव नही उठता और वो, रोटी और कराहती रहती  है
पांव नही उठता , वंही व्हील चेयर पर बाथरूम में भी उसे तकलीफ है पांव जो नही उठता
ये घिसटती तड़पती जिंदगी
पहले की उत्साही माँ याद आती है जो दौड़कर घरके काम करती थी
अब वो दूसरों के वष में है, परवश है
क्या करेगी, यदि जीना नही चाहती तब भी जीना है मई लगातार ईश्वर का स्मरण करती हूँ
कई भगवन उसे या तो, ठीक करो, या उठा लो
भाई-भाभी भी इस तकलीफ से नींद नही ले पाते
जो , भाई ड्यूटी में है, वो विवश हो कहता है
माँ अं थक गयी है .......... शरीर भी जब बोझ बन जाता है 

Thursday, 18 February 2016

बुआ जी के घर बिताये दिन क्या भूलने लगी हूँ, ४० वर्ष पहले यादों का अब क्या महत्व , सब इन्ही कहेंगे, कि आज मई जब वंहा नही, तो यादों में भी क्यों जाती हूँ. और वो घर जन्हा मई और बुआ ही रहते थे. दिन भर मई अपनी कक्षा की पढाई में व् खेलकूद में मग्न रहती थी . और साँझ जब बुआ जी रसोई कर चुकी होती , तो, वे फिर साँझा आरती करती थी. मई भी आरती के वक़्त उनके पास आ जाती, और आरती गाने लगती थी. वह समय आज तक स्मृति में  ,कि बहुत शांति होती थी, जिसे नीरवता कहते.
हम आरती गए रहे होते थे
और कोई अंजाना सा भय भी भीतर महसूस होता था, जाने कौन सा साया था, की कई बार गाते हुए भी सिहरन महसूस  . शायद बुआ जी की सौत के अचानक मर जाने से मन में डॉ समा गया हो , पर वो कांपती सी आरती की लौ जैसी मई   भावना को आज भी महसूस करती हूँ .