वक़त कम है किन्तु ले चलती हूँ
अपने बचपन के आँगन में बुआजी के घर से मरी स्मृति शुरू होती है वंहा कि भोर , मुझे तारों के संग जगाती थी और मई चिड़ियन कि चहचहाट के साथ जागती घर के पीछे आती थी , यानि घर कि रसोई वाले हिस्से में , जंहा बुआजी चूल्हा जलाकर पानी गर्मकर, फिर चाय बना रही होती वंहा सहन में धुंए के बिच बुआ जी को चूल्हे कि आग फूंकते देखती, और खुद भी वंही आंचके सामने बैठ जाती थी, जो चूल्हे के सामने बैठते है, वो ही जानते है, कैसे बैठा जाता है
आज वो आंच, वो तपन नही है
हम जो सारा दिन बनाते खाते बतियते थे, वो दिन भी सूरज कि किरणों के साथ शुरू होता था
फइऋ....बअचपअणकअडउसऋअपऋअसहयएkyakrrahi, तेरी नहीं सुनो , तो तू कुछ अपनी क्र ही देती है चल कल शेष लिखूंगी , आज उसने मेरी लेखनी ही रोक ली मेरे , लिखने का जो अश्व एक बार थम जाये तो, फिर कल ही, सही
अपने बचपन के आँगन में बुआजी के घर से मरी स्मृति शुरू होती है वंहा कि भोर , मुझे तारों के संग जगाती थी और मई चिड़ियन कि चहचहाट के साथ जागती घर के पीछे आती थी , यानि घर कि रसोई वाले हिस्से में , जंहा बुआजी चूल्हा जलाकर पानी गर्मकर, फिर चाय बना रही होती वंहा सहन में धुंए के बिच बुआ जी को चूल्हे कि आग फूंकते देखती, और खुद भी वंही आंचके सामने बैठ जाती थी, जो चूल्हे के सामने बैठते है, वो ही जानते है, कैसे बैठा जाता है
आज वो आंच, वो तपन नही है
हम जो सारा दिन बनाते खाते बतियते थे, वो दिन भी सूरज कि किरणों के साथ शुरू होता था
फइऋ....बअचपअणकअडउसऋअपऋअसहयएkyakrrahi, तेरी नहीं सुनो , तो तू कुछ अपनी क्र ही देती है चल कल शेष लिखूंगी , आज उसने मेरी लेखनी ही रोक ली मेरे , लिखने का जो अश्व एक बार थम जाये तो, फिर कल ही, सही
thanks, darling
ReplyDeletesadi, meri nhi teri, meri to sirf mangani huyi thi, fir sauda ho gya, jise mai nibhati rahi, vo shadi nhi thi, ya h, vo ek contract tha, mujhpr shurten thi, jinhe koi bhi yuvti, nhi sah sakti
ReplyDeletetujhe tere vivah ki dher sari shubh-kamnaye