Sunday, 10 January 2016

माँ बीमार है, और बहुत  ,बहुत सारी बातें आज याद आ रही है, जब मई बुआ जी के यंहा से माँ के घर गयी, तो, वंहा जैसे प्राकृतिक वैभव बिखरा था, याद करती हूँ, इन ठण्ड के मौसम में तिल की फसल आँगन में आ चुकी होती थी, घर के पाटन पर धान के बोरे चढ़ाते नौकर, एक बार एक बेचारे नौकर ने सिपाही जैसी पेंट क्या पहनी, माँ की हंसी थमने का नाम नही लेती थी, माँ। .... ओह घर में कितना कुछ था, सब और सात्विकता और वैभव , वो भी बिना अहंकार और प्रदर्शन के। ..... 
खेतों में शीला बीनने जाती थी, एक गरीब स्त्री, ढेर से बच्चे उसके संग रहते थे 
और, वंही खेत से लौटते मैदानों में कुछ पत्थर निकालते वे पसीना बहते मजदुर , एक पत्थर निकलने में सुबह से साँझ हो जाती थी, और २ रुप्पल्लि भी हाथ में नही आती थी, क्या वक़्त था वो 
फिर भी हाथों पर हास का उजास फैला रहता था 
क्या क्या बताऊँ उस युग की बातें , सच माँ तुम्हारा वो वक़्त कहा लौट सकता है हममें वो म्हणत की कुवट नही और, माँ-बाबूजी, नौकर-चाकर सबके साथ खेती-बाड़ी में मस्त रहते थे , माँ। 

No comments:

Post a Comment