Sunday, 31 January 2016

मई
उस चौक से गुजर रही थी
वो, चौक पर नाले  एक चौकोर पत्थर पर
एक ४५  स्त्री कम कपड़ों में
वंहा लेती थी अलमस्त
दुनिया के रंजोगम अलहदा
न शर्म लिहाज तमगा
न कोई चिता फ़िक्र
जैसे खुले आसमान  निचे
ईश्वर की दुआओं को सहेजती
एक बोतल में पानी बाजु में रखे
मई सिहर उठी
जाने कितने दिनों भूखी
अपनों से ठुकराई
कपडे तक नहीं
पत्थर पर यूँ ही लेटे हुए
सब दुखों को नाले में फेंककर
किसी से कोई शिकायत नहीं
उसकी समझ से दूर
और , वो कोई वोटबैंक
 जिसे सरकारी मदद मिले
वो, स्त्री  बेचारी भी नहीं समझती
 जरूरतों से बची हुयी
किसी संत महात्मा तपस्वी जैसी
जिसने  जीवन को
अनजाने में साध लिया हो 

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