Tuesday, 26 January 2016

बहुत चाहकर भी ज्यादा नही लिख सकी हूँ, नए सिरे से संघर्ष है
लिखने के क्षेत्र में बहुत निराशा है, बहुत ऊर्जा , धन व् समय  लगता है, बदले में कुछ नही मिलता, यदि इतने  वक़्त में चाय की दुकान चलाये  लेखन से ज्यादा कमा सकते है
लिखने में कुछ आजकल मिलता नही , सब रचनाएँ जो भेजो वो, खो जाती है, लेखक दिल मसोस कर रह जाता है, किस्से दिल का हाल कहे , सब निकम्मा व् जाहिल समझते है , बेचारा दिन-हीन लेखक 

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