Wednesday, 13 January 2016

जब कपड़ो  के ढेर देखती हूँ तो, गांव की यात्रा में सहित में ठिठुरते दिन में मैंने उसे बिना ब्लौस देखि थी, मात्र चिथड़ों में देह लिपटे हुए, बेचारी जाने कहा से आ रही थी, हम कितने कपड़ो से अपने को ठण्ड से बचते है, और वे पगली औरतें अपने को ठण्ड से भी ज्यादा लोगों की नज़र से बचना चाहती है 
वे घर से निकल दी गयी औरतें, कंहा जाये , इस दिन दुनिया में कोई भी उनका नही होता 
गांव की ही पूर्णः याद आती है, जिसे उसके ससुराल वालों ने इज्ज्ज़त लूट के निकला, जब मायके आई तो, बाप व् भाइयों ने भी लूटा , फिर मायके वालों ने भी उसे घर से निकल डाला , कनहा जाती वो, बाजार टेकरा में रहती , पर वंहा भी लूटने वालों का ताँता लगा रहता था , कोई अपना नही, पर इज्जत लूटने सब हाजिर 
वो, कुछ माहों में गर्भवती हो जाती , पर उसे गर्भ गिरा देते थे 
गांव में शर्म लिहाज की दुहाई कौन देता , सब जैसे निर्ल्लज होकर, पूर्णा का तमाशा देखते थे 
पूरी जिंदगी एक हरी साडी से तन ढकती , अंत में अस्पताल गयी, और जिले में एक लावारिश मौत , जो गांव की पहचान बन चुकी थी 
इन्ही, नही मैंने एक जीप में कुछ लोगों को एक लड़की को बांधकर ले जाते देखा था, मैं बोल उठी थी, की उसमे लड़की बंधी है 
पर, मेरी आवाज कंही नही पहुंची थी, मैं खुद बंधक जैसे जीवन में थी, जो लोग लड़कियां उठा लेते है, वे बहुत राशुख वाले होते है , उन्हें रोकना सबके बुते की बात नही, ये घटना २५ वर्ष पुरानी है, पर लड़की का दर्द वन्हीं है , सामूहिक व् संगठित रूप से जो लड़कियों को उठाते व् उनकी मिलकर इज्जत लूटते है, उन्हें रोकना जरुरी है 
मैंने गोंदिया रेल में एक युवती की लाश का चित्र देखि थी, जो पुलिस ने लगाया था 
फिर मैंने गोरखपुर जाते वक़्त जब एक पगली को दबंगो द्वारा गाली गलौज देते सुनी थी, तो मैंने प्रधानमंत्री जी को लिखा था ,पत्र भी आया है, उसका, विशेष दस्ता लगाया जा रहा है, पर हमें बच्चियों को सामूहिक लुटेरों से बचना ही होगा 

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