Wednesday, 29 October 2014
Monday, 27 October 2014
आँगन
आँगन बनारस की बयार से बहुत आगे है
आज इसकी ५०५० बार २०६ पोस्ट पढ़ी जा चुकी है
जबकि , बनारस की बयार की १०२७ पोस्ट
५१६९ बार पढ़ी गयी है
आँगन को मेरी माता जी व् बुआ जी का आशीर्वाद मिला है उनका
अकिंचन स्नेह है
मई बहुत याद करती हूँ की
बुआ जी के घर जैसी दिवाली थी वो, आज तक याद आती है
तब, जो खेती की जाती थी गौएँ पाली जाती थी तब, घरों में सब कुछ
भरा भरा सा था
आज जो किलो के भाव से मिलता है
तो, पैसे गिनते पसीने छुट्टे है
तब, कुढ़ो व् पायली से
बेहिसाब गिना जाता था आज वे शब्द हंसी का सबब बन गए
और हम महंगाई से बदहाल हो गए हमारी ये समृद्धि तो बीएस नाम की है
वो, तो वास्तविक थी
आँगन बनारस की बयार से बहुत आगे है
आज इसकी ५०५० बार २०६ पोस्ट पढ़ी जा चुकी है
जबकि , बनारस की बयार की १०२७ पोस्ट
५१६९ बार पढ़ी गयी है
आँगन को मेरी माता जी व् बुआ जी का आशीर्वाद मिला है उनका
अकिंचन स्नेह है
मई बहुत याद करती हूँ की
बुआ जी के घर जैसी दिवाली थी वो, आज तक याद आती है
तब, जो खेती की जाती थी गौएँ पाली जाती थी तब, घरों में सब कुछ
भरा भरा सा था
आज जो किलो के भाव से मिलता है
तो, पैसे गिनते पसीने छुट्टे है
तब, कुढ़ो व् पायली से
बेहिसाब गिना जाता था आज वे शब्द हंसी का सबब बन गए
और हम महंगाई से बदहाल हो गए हमारी ये समृद्धि तो बीएस नाम की है
वो, तो वास्तविक थी
Sunday, 26 October 2014
वक़्त
वक़्त नही मिलता है
क्योंकि, मेरे पास लैपटॉप नही है
खरीदने की इजाजत नही है
लिखना सिखने भी वक़्त होना
१ ऑवर में मई सिर्फ देख सकती हूँ
ज्यादा कुछ नही होता
आप सब मेरी विवशता समझे की मई क्यों इतना
ठहरा लेखन करती हूँ
बहुत से फ़र्ज़ है
जो निभाने है
हिंदुस्तान का लेखक संकोची ज्यादा है
उसे प्रोफेशनल होना होगा
मेरी किताब, पारिजात जल्द आ रही है
आप , सॉरी
मेरी दूसरी किताब भी उसके बाद लाइन में है
उसके बाद मेरे नावेल, लागि नहीं। . छूटे रामा
पर काम होगा
इन सबमे वक़्त लगेगा
चूँकि पहले से जो लिखा है
वो, नही छाप साकी हूँ
तो, रुका सा लगता है
अबतो, सोनू का घर बसना पहली प्राथमिकता है फिरसे मुंबई जाने की सोचने लगती हु
वक़्त फिर हाथ से निकल रहा है
वक़्त नही मिलता है
क्योंकि, मेरे पास लैपटॉप नही है
खरीदने की इजाजत नही है
लिखना सिखने भी वक़्त होना
१ ऑवर में मई सिर्फ देख सकती हूँ
ज्यादा कुछ नही होता
आप सब मेरी विवशता समझे की मई क्यों इतना
ठहरा लेखन करती हूँ
बहुत से फ़र्ज़ है
जो निभाने है
हिंदुस्तान का लेखक संकोची ज्यादा है
उसे प्रोफेशनल होना होगा
मेरी किताब, पारिजात जल्द आ रही है
आप , सॉरी
मेरी दूसरी किताब भी उसके बाद लाइन में है
उसके बाद मेरे नावेल, लागि नहीं। . छूटे रामा
पर काम होगा
इन सबमे वक़्त लगेगा
चूँकि पहले से जो लिखा है
वो, नही छाप साकी हूँ
तो, रुका सा लगता है
अबतो, सोनू का घर बसना पहली प्राथमिकता है फिरसे मुंबई जाने की सोचने लगती हु
वक़्त फिर हाथ से निकल रहा है
Saturday, 25 October 2014
बुआ जी के घर वो मौसम ऐसा ही था बुआ जी बहुत याद आती है उनके घर एकांत था किन्तु
हम सब मोहल्ले के साथ थे
बुआ जी के बड़े से घर की यादें ठहरी हुई है
कितनी बातेहै, जो बहुत याद आती है
उनकी, वो आरती, जो सब चले जाते थे तब बुआ जी कितनी अन्यमनस्क
होकर घर के द्वार लगती थी
लिख नही पा रही हु बहुत ही गहरी स्मृति है वो, ठहरे हुए दिन वो, घर का सूनापन
लेकिन कभी लगा नही की हम अकेले है
हम सब मोहल्ले के साथ थे
बुआ जी के बड़े से घर की यादें ठहरी हुई है
कितनी बातेहै, जो बहुत याद आती है
उनकी, वो आरती, जो सब चले जाते थे तब बुआ जी कितनी अन्यमनस्क
होकर घर के द्वार लगती थी
लिख नही पा रही हु बहुत ही गहरी स्मृति है वो, ठहरे हुए दिन वो, घर का सूनापन
लेकिन कभी लगा नही की हम अकेले है
Wednesday, 22 October 2014
वे दिन
वो, दिन स्वर्णिम थे चारों और
सब तरफ हरियाली थी,
घर में धन्य भरा होता था , बरषि के बाद तालाब भरा होता था,
घर के आँगन में फूलों की क्यारियों में
पुष्प महकते थे
घर में चारों और खेती की फसल की महक फैली होती थी
आँगन में अनाज सुखाया जा रहा होता था घर के ढोलों में धन भरा होता था
धान, जिसका चावल स्वादिस्ट व् सुपाच्य होता था घर की बड़ियों में पिछवाड़े
सब्जियों की अवाक् होती
सुबह हल्की ठण्ड होती
पर हमारे पास ज्यादा स्वेटर नही होते थे हम
सुबह उठकर सी सी करते इधर उधर भागते,
उछल कूद करते
जो, गौवें जनि होती
उनके बछड़ों संग खेलते
बहुत प्यारे दिन थे,
और मन चाहा पढ़ते थे,
बहुत अच्छा लगता था
घर में नौकर चाकर की चहल पहल होती थी
लगता ही नही था
की वे दिन कभी बिट जायेंगे
किन्तु, बिट चुके है
यादें है की
हमारे माता पिता ने बहुत म्हणत की थी
सबके साथ मिलकर
नौकर लगाकर खेती करते थे तो घर-आंगनों में धन-धान्य बिखरा व् भरा होता था अब, तो कल्पना भी नही है
की घरों में इतना कुछ धान्य संग्रह हो सके
उसे सम्भलना, १२ माह उसकी देखरेख होती थी घर में बनिहारें आती थी
अब, एक नौकर भी नही रख पते
खेती तो दूर की बात है
आँगन बुहारने में पसीने छूट जाते है
तब नौकरों की मजदूरी कम थी,
तो, एक दो नही १० नौकर बनिहारें १२ माह रहते थे सबको धान देते थे
वे दिन भर घर के व्
खेती के काम करते
गौओं को भी बहुत विधिवत सेवाकर पलटे थे आज की तरह नही की उनका जितना चाहा दूध
निचोड़ा , और सड़कों पर छोड़ दिया फिर उन्हें चारा-पानी मिले न मिले
वो, दिन स्वर्णिम थे चारों और
सब तरफ हरियाली थी,
घर में धन्य भरा होता था , बरषि के बाद तालाब भरा होता था,
घर के आँगन में फूलों की क्यारियों में
पुष्प महकते थे
घर में चारों और खेती की फसल की महक फैली होती थी
आँगन में अनाज सुखाया जा रहा होता था घर के ढोलों में धन भरा होता था
धान, जिसका चावल स्वादिस्ट व् सुपाच्य होता था घर की बड़ियों में पिछवाड़े
सब्जियों की अवाक् होती
सुबह हल्की ठण्ड होती
पर हमारे पास ज्यादा स्वेटर नही होते थे हम
सुबह उठकर सी सी करते इधर उधर भागते,
उछल कूद करते
जो, गौवें जनि होती
उनके बछड़ों संग खेलते
बहुत प्यारे दिन थे,
और मन चाहा पढ़ते थे,
बहुत अच्छा लगता था
घर में नौकर चाकर की चहल पहल होती थी
लगता ही नही था
की वे दिन कभी बिट जायेंगे
किन्तु, बिट चुके है
यादें है की
हमारे माता पिता ने बहुत म्हणत की थी
सबके साथ मिलकर
नौकर लगाकर खेती करते थे तो घर-आंगनों में धन-धान्य बिखरा व् भरा होता था अब, तो कल्पना भी नही है
की घरों में इतना कुछ धान्य संग्रह हो सके
उसे सम्भलना, १२ माह उसकी देखरेख होती थी घर में बनिहारें आती थी
अब, एक नौकर भी नही रख पते
खेती तो दूर की बात है
आँगन बुहारने में पसीने छूट जाते है
तब नौकरों की मजदूरी कम थी,
तो, एक दो नही १० नौकर बनिहारें १२ माह रहते थे सबको धान देते थे
वे दिन भर घर के व्
खेती के काम करते
गौओं को भी बहुत विधिवत सेवाकर पलटे थे आज की तरह नही की उनका जितना चाहा दूध
निचोड़ा , और सड़कों पर छोड़ दिया फिर उन्हें चारा-पानी मिले न मिले
Monday, 20 October 2014
जो
जो हमारे अपने थे
वो, गांव से थे
नही पता वो सब कहा पीछे छूट गए
जो, खेती करते थे
खेती में ही रमे रहते थे
जीवन इतना कर्कश नही था
जैसा आज भागदौड़ व् स्वार्थ से हो गया है
हमने विकाश की अंधी दौड़ में
उन लोगों को खो दिया है
जो, बहुत प्यारे थे
जो खेती करते थे गौ पालते थे
ज्यादा शान नही थी
फिर सिनेमा ने जिंदगी में
ऐसे फैशन लाया
जो, हमारे पैसे खाता है
हम बहुत ज्यादा कमाते है
किन्तु अकेले रहते है
प्रायः टीवी के सहारे
जो जीवन पहले था
बहुत अपनेपन लिए था
जो, लोग हमसे बिछड़कर बहुत दूर चले गए
वो, हमे बहुत चाहते थे
बहुत फैशन नही करते थे
किन्तु, बड़े सुंदर थे
जाने कहा चले गए
वो, सब,
जिनसे हमारे त्यौहार व् व्यहार मधुर थे
आज हमसे सभी दूर है
हम अकेले त्यौहार मनाते है
अपने विगत को याद करते हुए
जो हमारे अपने थे
वो, गांव से थे
नही पता वो सब कहा पीछे छूट गए
जो, खेती करते थे
खेती में ही रमे रहते थे
जीवन इतना कर्कश नही था
जैसा आज भागदौड़ व् स्वार्थ से हो गया है
हमने विकाश की अंधी दौड़ में
उन लोगों को खो दिया है
जो, बहुत प्यारे थे
जो खेती करते थे गौ पालते थे
ज्यादा शान नही थी
फिर सिनेमा ने जिंदगी में
ऐसे फैशन लाया
जो, हमारे पैसे खाता है
हम बहुत ज्यादा कमाते है
किन्तु अकेले रहते है
प्रायः टीवी के सहारे
जो जीवन पहले था
बहुत अपनेपन लिए था
जो, लोग हमसे बिछड़कर बहुत दूर चले गए
वो, हमे बहुत चाहते थे
बहुत फैशन नही करते थे
किन्तु, बड़े सुंदर थे
जाने कहा चले गए
वो, सब,
जिनसे हमारे त्यौहार व् व्यहार मधुर थे
आज हमसे सभी दूर है
हम अकेले त्यौहार मनाते है
अपने विगत को याद करते हुए
Saturday, 18 October 2014
माँ
माँ से २-३ साल पहले मिलने गयी थी
तो, माँ बोली, बाई
अब तो उतरती आई है
ये उसके सर्वथा विपरीत है
जिसमे उम्र के चढ़ते दौर को भी माँ ने देखा था ये उतरती
उम्र भी माँ देख रही है
माँ ठीक कहती है
मुझे भी नही पता था की उतरती
आ जाएगी
आज ही एक महोदय मिले
बोले, आप उसवक्त तो,
इतने कमजोर नही थी
बेशक मैंने बहुत संघर्ष किया है
और अपने बेटे के बहुत ही
परेशानी के दौर को अकेले झेल है
तब, सभी पीर , और मंदिर तक मई गयी हूँ
वंही से दुआएं ली है
आशा करती हूँ
सबकी दुआ रंग लाएगी
मेरे बेटे के जीवन में
सफलता आएगी
माँ से २-३ साल पहले मिलने गयी थी
तो, माँ बोली, बाई
अब तो उतरती आई है
ये उसके सर्वथा विपरीत है
जिसमे उम्र के चढ़ते दौर को भी माँ ने देखा था ये उतरती
उम्र भी माँ देख रही है
माँ ठीक कहती है
मुझे भी नही पता था की उतरती
आ जाएगी
आज ही एक महोदय मिले
बोले, आप उसवक्त तो,
इतने कमजोर नही थी
बेशक मैंने बहुत संघर्ष किया है
और अपने बेटे के बहुत ही
परेशानी के दौर को अकेले झेल है
तब, सभी पीर , और मंदिर तक मई गयी हूँ
वंही से दुआएं ली है
आशा करती हूँ
सबकी दुआ रंग लाएगी
मेरे बेटे के जीवन में
सफलता आएगी
Friday, 17 October 2014
दिवाली
दिवाली के वक़्त में
दिवाली में सभी क्या क्या नही करते
मेरी छोटी बहन है
बहुत प्यारी है घर भी बहुत बड़ा है, उसका
किन्तु, दिवाली में उदाश है
क्योंकि , दिवाली में उसे घरसे नई साड़ी लेने की इजाजत नही है
वो, बहुत गलत महसूस करती है
कहती है इतना सब-कुछ है
किन्तु, मेरे लिए कुछ नही है
सब कुछ होकर भी
जो, आदमी अपनी पत्नी को एक साड़ी लेकर न दे सके
और दिवाली में साड़ी को तरसाये
क्या करे,
वैसे भी हम सब हमेशा उसे कुछ लेकर देते रहे
पर अब वो नही मांगती
मई सोचती हूँ की
वो, भी कोई ट्यूशन कर लेती तो
अपने लिए कुछ ले सकती
दूसरों के घरेलू मामलों में कुछ बोलना
उचित भी तो नही। ....
घर में बहुत सारी बातें होती है
किन्तु हम अपने घर के प्रति हमेशा
समर्पित ही रहेंगे
क्योंकि, घर हमारा आश्रय होता है हमारा वजूद भी हमारा
घर परिवार ही तो है………
दिवाली के वक़्त में
दिवाली में सभी क्या क्या नही करते
मेरी छोटी बहन है
बहुत प्यारी है घर भी बहुत बड़ा है, उसका
किन्तु, दिवाली में उदाश है
क्योंकि , दिवाली में उसे घरसे नई साड़ी लेने की इजाजत नही है
वो, बहुत गलत महसूस करती है
कहती है इतना सब-कुछ है
किन्तु, मेरे लिए कुछ नही है
सब कुछ होकर भी
जो, आदमी अपनी पत्नी को एक साड़ी लेकर न दे सके
और दिवाली में साड़ी को तरसाये
क्या करे,
वैसे भी हम सब हमेशा उसे कुछ लेकर देते रहे
पर अब वो नही मांगती
मई सोचती हूँ की
वो, भी कोई ट्यूशन कर लेती तो
अपने लिए कुछ ले सकती
दूसरों के घरेलू मामलों में कुछ बोलना
उचित भी तो नही। ....
घर में बहुत सारी बातें होती है
किन्तु हम अपने घर के प्रति हमेशा
समर्पित ही रहेंगे
क्योंकि, घर हमारा आश्रय होता है हमारा वजूद भी हमारा
घर परिवार ही तो है………
Wednesday, 15 October 2014
Sunday, 12 October 2014
आज चुप
आज चुपचाप बैठी थी, खूब तेज हवा चल रही है
जाने क्यों बुआ जी के घर बिताये दिन याद आ गए
बुआ जी के घर भी ऐसे ही दिन थे, क्या
हाँ, वो बरस ऐसा ही हवा पानी याद आ रहा है
मौसम की बेचैनी ऐसी ही हो गयी थी और
मुझे लगता है, खूब बारिश आई थी
तब , बहुत ओले गिरे थे
सब और पत्तियां बिखर जाती थी
जब हवा बी बारिश होती थी
सॉरी , बहुत डिस्टर्ब है
वो, वक़्त अलग था
जिंदगी को तब जाना नही था
जिंदगी क्या है
ये आज भी पता नही
किन्तु, बहुत सी चिंताएं तो है
अबतो, मई ईश्वर का स्मरण करती हूँ
आज चुपचाप बैठी थी, खूब तेज हवा चल रही है
जाने क्यों बुआ जी के घर बिताये दिन याद आ गए
बुआ जी के घर भी ऐसे ही दिन थे, क्या
हाँ, वो बरस ऐसा ही हवा पानी याद आ रहा है
मौसम की बेचैनी ऐसी ही हो गयी थी और
मुझे लगता है, खूब बारिश आई थी
तब , बहुत ओले गिरे थे
सब और पत्तियां बिखर जाती थी
जब हवा बी बारिश होती थी
सॉरी , बहुत डिस्टर्ब है
वो, वक़्त अलग था
जिंदगी को तब जाना नही था
जिंदगी क्या है
ये आज भी पता नही
किन्तु, बहुत सी चिंताएं तो है
अबतो, मई ईश्वर का स्मरण करती हूँ
Wednesday, 8 October 2014
Tuesday, 7 October 2014
Saturday, 4 October 2014
Friday, 3 October 2014
माँ को आज फोन पर बातें हुई
माँ को मई दशहरे की शुभकामना दे पाती
इसके पहले ही माँ ने
मुझे गांव आने की अनुनय की
माँ की आवाज में कितना अपनापन है
मई कल मासे मिलने जाउंगी
एक रत गांव जाकर लौटूंगी
तबतक आप सब मेरा घर देखिये
आप सभी की शुभकामना चाहिए
माँ से भजन सुन्ना
माँ की बातें सुन्ना
ये सब मेरे लिए सौभाग्य है
हम सब इस दशहरे साथ है
अगले बरस क्या हो
कौन जनता है
ये तो जिंदगी है
आप सभी को दशहरे की शुभकामनाये
और माँ का ढेर सारा आशीर्वाद भी
कल माँ से कितनी बातें होगी
माँ जो, हम सबके जाने पर
कितने तरह के पकवान बनती थी
वो, कितनी देरतक चूल्हे के सामने बैठे
आंच सहती हुयी
हमारे लिए बड़े टलती थी माँ तुम महान हो
मुझे पता है
सभी की माएं
ऐसी ही होती है
माँ को मई दशहरे की शुभकामना दे पाती
इसके पहले ही माँ ने
मुझे गांव आने की अनुनय की
माँ की आवाज में कितना अपनापन है
मई कल मासे मिलने जाउंगी
एक रत गांव जाकर लौटूंगी
तबतक आप सब मेरा घर देखिये
आप सभी की शुभकामना चाहिए
माँ से भजन सुन्ना
माँ की बातें सुन्ना
ये सब मेरे लिए सौभाग्य है
हम सब इस दशहरे साथ है
अगले बरस क्या हो
कौन जनता है
ये तो जिंदगी है
आप सभी को दशहरे की शुभकामनाये
और माँ का ढेर सारा आशीर्वाद भी
कल माँ से कितनी बातें होगी
माँ जो, हम सबके जाने पर
कितने तरह के पकवान बनती थी
वो, कितनी देरतक चूल्हे के सामने बैठे
आंच सहती हुयी
हमारे लिए बड़े टलती थी माँ तुम महान हो
मुझे पता है
सभी की माएं
ऐसी ही होती है
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