वे दिन
वो, दिन स्वर्णिम थे चारों और
सब तरफ हरियाली थी,
घर में धन्य भरा होता था , बरषि के बाद तालाब भरा होता था,
घर के आँगन में फूलों की क्यारियों में
पुष्प महकते थे
घर में चारों और खेती की फसल की महक फैली होती थी
आँगन में अनाज सुखाया जा रहा होता था घर के ढोलों में धन भरा होता था
धान, जिसका चावल स्वादिस्ट व् सुपाच्य होता था घर की बड़ियों में पिछवाड़े
सब्जियों की अवाक् होती
सुबह हल्की ठण्ड होती
पर हमारे पास ज्यादा स्वेटर नही होते थे हम
सुबह उठकर सी सी करते इधर उधर भागते,
उछल कूद करते
जो, गौवें जनि होती
उनके बछड़ों संग खेलते
बहुत प्यारे दिन थे,
और मन चाहा पढ़ते थे,
बहुत अच्छा लगता था
घर में नौकर चाकर की चहल पहल होती थी
लगता ही नही था
की वे दिन कभी बिट जायेंगे
किन्तु, बिट चुके है
यादें है की
हमारे माता पिता ने बहुत म्हणत की थी
सबके साथ मिलकर
नौकर लगाकर खेती करते थे तो घर-आंगनों में धन-धान्य बिखरा व् भरा होता था अब, तो कल्पना भी नही है
की घरों में इतना कुछ धान्य संग्रह हो सके
उसे सम्भलना, १२ माह उसकी देखरेख होती थी घर में बनिहारें आती थी
अब, एक नौकर भी नही रख पते
खेती तो दूर की बात है
आँगन बुहारने में पसीने छूट जाते है
तब नौकरों की मजदूरी कम थी,
तो, एक दो नही १० नौकर बनिहारें १२ माह रहते थे सबको धान देते थे
वे दिन भर घर के व्
खेती के काम करते
गौओं को भी बहुत विधिवत सेवाकर पलटे थे आज की तरह नही की उनका जितना चाहा दूध
निचोड़ा , और सड़कों पर छोड़ दिया फिर उन्हें चारा-पानी मिले न मिले
वो, दिन स्वर्णिम थे चारों और
सब तरफ हरियाली थी,
घर में धन्य भरा होता था , बरषि के बाद तालाब भरा होता था,
घर के आँगन में फूलों की क्यारियों में
पुष्प महकते थे
घर में चारों और खेती की फसल की महक फैली होती थी
आँगन में अनाज सुखाया जा रहा होता था घर के ढोलों में धन भरा होता था
धान, जिसका चावल स्वादिस्ट व् सुपाच्य होता था घर की बड़ियों में पिछवाड़े
सब्जियों की अवाक् होती
सुबह हल्की ठण्ड होती
पर हमारे पास ज्यादा स्वेटर नही होते थे हम
सुबह उठकर सी सी करते इधर उधर भागते,
उछल कूद करते
जो, गौवें जनि होती
उनके बछड़ों संग खेलते
बहुत प्यारे दिन थे,
और मन चाहा पढ़ते थे,
बहुत अच्छा लगता था
घर में नौकर चाकर की चहल पहल होती थी
लगता ही नही था
की वे दिन कभी बिट जायेंगे
किन्तु, बिट चुके है
यादें है की
हमारे माता पिता ने बहुत म्हणत की थी
सबके साथ मिलकर
नौकर लगाकर खेती करते थे तो घर-आंगनों में धन-धान्य बिखरा व् भरा होता था अब, तो कल्पना भी नही है
की घरों में इतना कुछ धान्य संग्रह हो सके
उसे सम्भलना, १२ माह उसकी देखरेख होती थी घर में बनिहारें आती थी
अब, एक नौकर भी नही रख पते
खेती तो दूर की बात है
आँगन बुहारने में पसीने छूट जाते है
तब नौकरों की मजदूरी कम थी,
तो, एक दो नही १० नौकर बनिहारें १२ माह रहते थे सबको धान देते थे
वे दिन भर घर के व्
खेती के काम करते
गौओं को भी बहुत विधिवत सेवाकर पलटे थे आज की तरह नही की उनका जितना चाहा दूध
निचोड़ा , और सड़कों पर छोड़ दिया फिर उन्हें चारा-पानी मिले न मिले
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