आज चुप
आज चुपचाप बैठी थी, खूब तेज हवा चल रही है
जाने क्यों बुआ जी के घर बिताये दिन याद आ गए
बुआ जी के घर भी ऐसे ही दिन थे, क्या
हाँ, वो बरस ऐसा ही हवा पानी याद आ रहा है
मौसम की बेचैनी ऐसी ही हो गयी थी और
मुझे लगता है, खूब बारिश आई थी
तब , बहुत ओले गिरे थे
सब और पत्तियां बिखर जाती थी
जब हवा बी बारिश होती थी
सॉरी , बहुत डिस्टर्ब है
वो, वक़्त अलग था
जिंदगी को तब जाना नही था
जिंदगी क्या है
ये आज भी पता नही
किन्तु, बहुत सी चिंताएं तो है
अबतो, मई ईश्वर का स्मरण करती हूँ
आज चुपचाप बैठी थी, खूब तेज हवा चल रही है
जाने क्यों बुआ जी के घर बिताये दिन याद आ गए
बुआ जी के घर भी ऐसे ही दिन थे, क्या
हाँ, वो बरस ऐसा ही हवा पानी याद आ रहा है
मौसम की बेचैनी ऐसी ही हो गयी थी और
मुझे लगता है, खूब बारिश आई थी
तब , बहुत ओले गिरे थे
सब और पत्तियां बिखर जाती थी
जब हवा बी बारिश होती थी
सॉरी , बहुत डिस्टर्ब है
वो, वक़्त अलग था
जिंदगी को तब जाना नही था
जिंदगी क्या है
ये आज भी पता नही
किन्तु, बहुत सी चिंताएं तो है
अबतो, मई ईश्वर का स्मरण करती हूँ
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