Thursday, 26 December 2013

माँ बताती है 
कि जिस बरस मई पैदा हुयी थी 
उस वक़त मकरसंक्रांति को, १५ दिन की थी 
माँ ने कैसे जन्म  दिया है 
कैसे हमे पाला पोषा है 
वो, हमारी बड़ी बुआ के यंहा थी 
वंहा उसे मात्र १५ दिन कि जचकी के बाद घर का सारा काम करना होता था 
वो , तो मेथी के कड़वे लड्डू बुआ जी उन्हें खिलाती थी 
माँ को बिना मेवे के मेथी व् गुड के कड़वे लड्डू खाकर पुरे घर का काम  करना होता था 
वो घर भी छोटा नही था एक घर में कई कमरे दालान, सहन होते थे 
वो घर दोहरे तिहरे घरों से मिलकर बना था जंहा एक नही तिन चार आंगन होते थे 
घर कि चाहर दिवारी के भीतर ही उनकी दुनिया होती थी किन्तु, मेरी माँ घर के सारे कम निपटा क्र पैदल ही भगवत कथा सुनने  में लेकर जाती थी मुझे माँ कि गोद में नींद आती, तब माँ भागवत कथा का आनन्द में विभोर होकर कृष्ण भक्ति में डूबकर अपना दुःख भूल जाती थी 

Wednesday, 25 December 2013

माँ 
माँ घर का आला हो गयी 
माँ ने सहे इतने दुःख 
कि ,दर्द का प्याला हो गयी 

Thursday, 19 December 2013

हमारा टौमी 
मई जब उस घर में गयी तो, वंहा नन्हा सा टॉमी अपनी माँ व् बहन लाली के साथ मेरे घर आता, उसे खिलने में मुझे अच्छा लगता था , मेरा बीटा भी उनके बीच अपनी उदासी भूल जाता , जब दोपहर में मई सोती , तो मेरे सर कि और वो अपनी पूंछ करके बैठता, और मेरे सर को पूंछ से सहलाता 
बाद में वह घर से हमे जाना पड़ा 
अब जब उधर से गुजरती हूँ, तो मुझे देखते ही , वो दौड़कर आता है, मुझे देख जोरों से पूंछ हिला क्र स्नेह जताता है , जब रोटी देती हूँ, तो वो अपनी तिन ही टांगों पर उचकता है, व् लहराकर रोटी छीनकर खाता है 
वो, कुत्ता तिन टांगों व् चौथी आधी तंग का , टॉमी है, बहुत ही प्यारा सा पप्पी 

Friday, 13 December 2013

घर में सब कुछ है 
बहुत कुछ है 
पर , माँ बाबूजी नही हो 
तो, क्या घर गाँव , आँगन का 
कोई मतलब होगा 
उनके बिना 

Monday, 9 December 2013

तुम 
तुम जो कहो 
तुम जो चाहो 
तुम जो करो 
वंही , मेरे खुशियों का 
बसेरा है 

Thursday, 5 December 2013

babuji

आज आलोक श्रीवास्तव कि कविता पढ़ी 
बाबूजी बहुत याद आये 
बाबूजी हमेशा कोइना कोई काम करते ही रहते है 
उनके होने से जैसे घर में सहन में 
शीतल छाँव का अहसास होता है 
जैसे कि, हम किसी 
घने छायादार दरख्त के साये में हो 
आज आलोक श्रीवास्तव कि कविता पढ़ी 
बाबूजी बहुत याद आये 
बाबूजी हमेशा कोइना कोई काम करते ही रहते है 
उनके होने से जैसे घर में सहन में 
शीतल छाँव का अहसास होता है 
जैसे कि, हम किसी 
घने छायादार दरख्त के साये में हो 
आज अलोक श्रीवास्तव कि कविता पढ़ी 
बाबूजी बहुत यद् अाये 

Tuesday, 19 November 2013

एक दो तिन चार 
जो तुझे याद करे 
उसे जूट मार 

Saturday, 9 November 2013

अब गांव कि भी यद् नही अति 

Tuesday, 5 November 2013

दीवाली तो बुआ जी के घर कि होती थी 
बहुत अच्छी यादें है 
अभी सिरमे दर्द है 
वर्ण लिखती 

Tuesday, 29 October 2013

आज मेरा ये ग्रामीण क्षेत्र बहुत पिछड़ गया है 
गांव के मजदुर गंदी गलियां बकते है 
उन्हें रोकने वाला अब कोई नही है 
क्योंकि , अब २ दिन कि मजदूरी में म्हणे भर का राशन अत है 
बाकि से वे शराब पिटे है 
ये बेहद गंदी बात है 
किन्तु राजनीती ने देश को वंहा पहुंचा दिया है 
जंहा , देश में मेहनती व् ईमानदार शखस ही म्हणत करके कमाता है 
बाकि सरकारी खैरात कि खाते व् मौज उड़ाते है 
कोई भी कम करने वाले को हेलू समझते है 

Sunday, 20 October 2013

tum angan ki chiriya

तुम खुश रहोगी तुम भी किसी आंगन में 
फूल बनकर खिलोगी 
तुम भी एक दिन खुशियों से मिलोगी 
मेरी जान, मत होना उदाश 
क्योंकि, तुम्हारे दामन में भी है 
खुशियों के कुछ पल 
क्योंकि, उपर वाला 
सभी के लिए 
बनता है, खुशियों का संसार 

Saturday, 19 October 2013

tum khush rahna

हाँ तुम खुश होना 
मई तुम्हारे लिए 
रोज कविता लिखूंगी 

Saturday, 28 September 2013

mujhe hindi me nhi likhne dete

pta hai, mujhe hindi me nhi likhne mil raha
jaisa mil raha , vaise hi likhungi
bua ji ke ghar, jb nvadin ki death ho gyi to
vnha ka mahol rahshya purn ho gya tha
aaj ke hi subah, ya kl ki rat me, 3 bje ke bad
us sal, mai dr gyi thi
bua ji mujhe ghar me kiraye walon ke sang chhod kr gyi thi
shradh krne
mai us bde se ghar me, bua ji ke palang pr akeli soyi thi
side me kiraye wale, nv-vivahit dampati soye the
mujhe vo log dikhe the
bua ji ke ghar ke mrt log
fufa ji,ka beta, aur vo nvadin
haan, usi sal to uski death huyi thi
vo, mujhe dikhne lgi thi
jb, mai mmta ke sath
dhabe yani upr patan pr uski sirhani ko fad kr
usse gudiya bna rahi thi
nvadin, bahut hi gusse me dikhi thi
uske lambe bal the, vo sidi pr khadi mujhe dekh rahi thi
mai use dekh drkr chillane lgi thi
kitna dr tha, mere bachpan me
kitni sari chhaya yen thi, vnha
buaji, ke ghar mai us abodh umr me
akele un sabse jujh rahi thi
fir, mujhe aaj ke hi din
yani ki pitr-paksh ki navmi ko
vapas lautna pda tha
bua ji ke ghar se
un rahashy myi pretatmaon ke utpat se
bhaybhit hokr maine chhoda tha
bua ji ka ghar
matr 10 ya 11 ki umr me
maine jheli thi, maut ki krur ahat v akraman

Wednesday, 25 September 2013

fir kya huwa

bua ji ke ynha nvadin ko apne aapme khoye sochte dekhi
vo, mera bachpan tha, 
vnha ki pratek baten rahashy purn thi
nvadin jyada kisi se nhi bolti thi
ek udasi si us pr tari rahti
vo, jane kya sochti rahti thi
uska pahla vivah tut chuka tha
bua ji ke bete ke na rahne pr santan ki asha se use laya gya tha
fir fufa ki mritu ho gyi thi
5 sal me do mauten, ghar me durdin ka matmi saya tha
ese mahaul me mujhe bua le gyi thi
kahte h, mai1 sal 6 mah ke aspas ki thi
bua ke ghar me mere jane se kuchh halchal hone lgi
fir din apni gti se gujrne lge the
bua se unki saut ki ldai kabhi-kabhar hoti
fir sab samany ho jata
mujhe koi frk nhi padta tha, mai khel me mashgul rahti
mujhe achcha lgta tha, bua ki god me khelna
fir, nvadin ki death, mrtyu achanak grmi me ho gyi
vo, uske mayke gyi, vnhi se nhi lauti
uski mrtyu ki khabar ayi thi
bua, mujhe lekr nha gyi thi, jnha uski mrtyu huyi thi
fir, use agni ko arpit krke hm vapas aye the
mai tb chhoti thi
kintu, maine arthi pr soyi, nvadin ko dekhi thi
mujhe yad h, use lgatar dekhte, mai sahsa bhaybhit ho gyi thi
mera dhyan uske danton ki aur gya tha..
maine kisi se nhi btayi thi
fir, ghar lautne pr sab uski hi baten krte rahe the
vo, ghar ki samne ki chhapri, dahal me akele baithi rahti thi
ane jane walon ko niharti, apne me gumsum
sbko pta chal gya tha, ki chhoti savjin nhi rahi
fufa sav ji kahlate the, so unki ptni ko isi nam se jana jata tha
ye ek, lok rit thi, boliyon ke deshaj swarup
mujhe us vqt ka samay yad ata h
meri yadon ke sangrhalay se
nvadin ko ye bhavbhina smarn

Tuesday, 24 September 2013

nvadin

vo ghatna tb ki hai, jb mai bua ji ke ghar thi
vnha mai do sal ki umr se thi, shyad usse bhi km umr me vnha bua ji ne le gyi thi
sb vnha mujhe behad chahte the, bua ji ke padosh se sabhi ate, sbki sneh patr thi mai 
tbm, vidhva bua ke ghar thi, unki saut, yani ki sah-patni, use sabhi chhoti hi kahte
bua ji chhoti hi, kahti thi, un dono me nhi patti thi, kintu, ghar me uska hona kitna ashray tha, ye uski maut se pta chla. vo prath ka kam nipta kr samne bhaith jati
yun, to ghar me naukar the, kintu rasoi to, khud ho krte
vo, bua ji ki saut ko, sabhi nvadin kahte
uski, kahani bahut karun h,
vo, bau ke ekmatr bete ki maut ke bad santan ke liye layi gyi thi
fufa ki maut se ghar me sanata tha, donon hi sah-patniyan ragti, sath me mai apne khelon me mashgul
mujhe nhi pta tha, ki vnha kitni bojhilta hai
mai sahaj hi, apne bachman me mgn thi
nvadin ko tirskar hi milta tha
jb, vo bua ji sng, hmare bdi bua ke ganv jati
vnha, bahut se reste-nate ke log ate
sb aurten, nvadin ki hnsi udati thi
uspr hnsti
jbki nvadin bahut sundar thi, unci v sanche me dhla sharir
dudh di gori, kintu, dukhon se clant, v yuva vidhva ka jivan kitna dukhmay tha
ye kl likhungi
chahti hu, ki mujhe hindi ka print mile
meri help kro

Thursday, 19 September 2013

maa ki bhakti

माँ की भक्ति देखकर अचंभित हूँ
आशंकित भी हूँ
माँ,तुम किस तरह से
इतनी तकलीफ में भी
जीवित रही
अपनी भक्ति के बल पर
माँ , तुम महँ हो
मुझे गर्व है की मई
आपकी संतान हूँ 

maa bhi bimar

माँ भी बीमार
भाभी भी बीमार
मुझे नही अच्चा लगता कुछ भी 

Wednesday, 18 September 2013

ma ko yad krti hun

 उदाश होती हूँ
जब, निराश हो जाती हूँ
तो, माँ को याद कर लेती हूँ
माँ की वो मूरत यद् अति है
घर के बिच के कक्ष में बैठी
वो, आँखें बंद किये प्रभु को भजति है
माँ तुम कितनी महान हो
मई तो , जरा सी बात में मरने की सोचती हूँ 

jb dekhi maa ko

जब माँ को गाँव जाकर देखी , तो लगा, की माँ कितनी महँ है
माँ महँ है , माहान है , महान है
माँ जिस हालत में जी रही है
वो, असं नही है
उसे होली के दिन से कमर में फ्रैक्चर है
ओप्रसोन नही हो सकता
वो, दर्द से जैसे तदपि है,
तड़पी है
हम एक पल को तडपते तो जान निकल जाती
उसे किसी ने नही दिया , इओदेक्ष या फ़ास्ट रिलीफ
मई परसों, उसके पास पैसे से , उसको ये दवाएं ले आई
अब, वो बेचारी किसी तरह से तकलीफ से मुक्त हो रही
कोई, उसे वोलिनी लेकर नही लाया
वो तडपती रही
माँ तुम कितनी महँ हो 

nhi kr sakti , atam-htya

अपने आपकी हत्या नही कर सकती
क्योंकि, मुझे मिटाने वाले मेरे अपने जो है
एक जद्दोजहद , जो जिंदगी  शुरुवात से चल रही है
ख़त्म नही होती 

Tuesday, 10 September 2013

dekhungi ispar ya uspar

देखूंगी इस पार  या
या उसपर मई देखूंगी
इस पार से उस पार जाना महज एक कल्पना हो सकती है
किन्तु, ये पांति पर गौर कीजिये 

Thursday, 29 August 2013

tej ho rahi h, barish

इस बरस बारिश ऐसे हुयी है , जैसे बचपन के दिनों में होती थी , सारा अषाढ़ बरसा है , जिस दिन से ये लगा है,एक दिन भी बरसात नही थमी है।   यंहा बलाघात में अबतक, 1400 mm से ज्यादा बरस चुकी है।
वो बचपन के दिन, भी ऐसे ही बरसते होते थे,जब से धुल भरी आंधी के आमों का सीजन जाता था, बरसात शुरू होती थी , तो खेती केकाम भी चलते।  वो एक अलग ही दौर था , सम्पन्नता का वक्त,घर में कामवालियों व् नौकरों का हुजूम होता था।  तब सबको धान देते थे , परहा  के  लिए , वो सब कामवालियां आकर लेजाती , कितने दिन धान गिनाई का कम उपर वाले ढाबे में होता था।
बुआ जी के घर के वो दिन, जो मेरी यादों में है , वो बहुत ही मधुर स्म्रतियों से भरे है, स्नेहिल माहौल में रहते थे , बुआ जी के बहुत बड़े घर में मई उनके साथ रहती , किन्तु डर नही लगता था।  तब, मई ममता के संग , उस बरस स्कूल से, जो बुआ जी के घर के पीछे था, boys स्कूल से मैंने कई क्यारियां लाकर लगाई थी , बुआ जी के घर के पिछवाड़े के आँगन में , और वो सब लहक उठी थी, मई छठवीं कक्षा में गयी थी , नही जानती थी, की बुआ जी, का घर उस बरस छुट जाने वाला है।
सच बहुत ही दुःख होता है ,उस बिछुड़ने के दर्द को आज भी भीतर जीवित पाती  हूँ। मै  तब संध्या में पुजारी जी के साथ , जाती थी, हमारे घर के मन्दिर में आरती करने, वो मन्दिर फूफाजी ने बनाये थे, ममता के घर के सामने ही था , तो ममता भी आ जाती थी।  वो कितना सुखद समय था , लगता था, जैसे वो दिन हमेशा एक जैसे ही रहेंगे। किन्तु, वो बीत  गये
बुआ जी जब बारिश में अपने खेतों में परहा लगवाने जाती तो , वंहा जाने के लिए , घुटनों से उपर पानी से गुजरना होता, क्योंकि, जो रास्ता होता , वो नाले में बदल जाता था , मई दोपहर को खाने के लिए घरआती , तो घर में बुआ जी के नही रहने पर , रखु बाई आ जाती, जो एक विधवा पडोषण थी, और सामने ही रहती थी, किन्तु, घर दूर ही होते थे , क्योंकि, हमारा घर इतना विस्तृत था , की दुसरे घरों की दुरी ज्यादा ही लगती थी , बाद में मेरे न रहने पर बुआ इ ने बाजु की खाली  जमीं बेच दी ,ताकि, उन्हें पड़ोश नजदीक महसूस हो।  मै उस बरस अपने खेलों व् पढ़ाई में ही मग्न थी , नही मालूम था, की कुछ ऐसा घटित हो जायेगा , की बुआ जी का घर व् साथ छुट जायेगा , व् उनका जीवन फिरसे घोर दुखों से भर जायेगा।
मेरे बुआ जी के पास जाने के पहले , वो अपने इकलौते बेटे को, पति को, व् अपनी नन्द को खो चुकी थी, मेरे आने के साल गर्मी उनके पास रहने वाली उनकी सौत भी गुजर गयी थी। घर में रह्श्यम्यी   विषाद की छाया पड़  गयी थी।  वो उदाशी का साल था, मैंने जिसे अपनी उम्र के ११ वें बरस लगते ही झेला , वो दुःख था, बुआ जी के घर से अपने बाउजी के घर लौटने का , मेरे लिए तो, वन्ही मेरा घर था।
आजतक, इस उम्र में भी यंही लगता है , की बुआ जी का घर ही, मेरा घर था, उसके बाद तो, बस मै प्रवाशी ही रही हूँ ,यंहा तक की अपने घर में भी यंही लगता है , की मै यंहा किसी के कम से हूँ, जबकि बुआ जी के घर लगता था, की मै वंहा अपनी सम्पूर्ण खुशियों के साथ हूँ
आज बहुत तेज बारिश और कैफ़े में भीड़ के बिच इतना ही लिख सकी हूँ , कल बतौंगी, वो घर के अहसास , जन्हा मै घुल मिल गयी थी , जो मेरे भीतर आज भी अपने स्पंदन के साथ जिन्दा है 

Tuesday, 27 August 2013

ho rahi hai, bhadon ki barish

आज जब भादो माह की सप्तमी में अचानक ही , झमाझम बारिश होने लगी है , मुझे बुआ जी के घर में बिताये , वो दिन याद  आ रहे है , जब लगता था, की जिंदगी बस यंही है , सोच भी नही सकती  थी, की कभी वंहा से जाना होगा।  बुआ जी के उस बड़े से घर में बारिश का संगीत गूंजा करता था।  ओर्नियोन के छप्परों से गिरते पानी का संगीत मन में समा जाता था।  व् स्कूल जाते हुए वो दिन बहुत प्यार से गुजरते थे।  मेरी सहेली ममता के साथ स्कूल से लौट क्र, हम दोनों अपने खेल में खो जाते थे।  वो गाँव की , क्या करूं, तेरा 

Wednesday, 21 August 2013

lagi re...

 पता है ,उस दिन के बाद ममता से मेरी कट्टी  थी ,ममता मुझे मारने की धमकी देती , और मै उससे डर कर , उसके घर के सामने से लुकते - छिपते जाती थी , स्कूल।  ऐसे ही माह निकल गया था , तभी रक्षा-बंधन आया , उसके दुसरे दिन, भुजरिया थी, बस साँझ के समय  मै बुआजी के साथ , सामने सबसे सबसे भुजलिया लेने बैठी थी , कि ममता अपने भैया के संग आयी , बुआजी के साथ मुझे भी भुजली देकर नमस्ते की, और हमारी  पहली व् आखिरी लड़ाई का अंत हो गया , फिर हम कभी नही झगडे , लड़ाई का कोई  था।  हम  अच्छी सहेलियां थी , की जबतक मै बुआ के गाँव से लौट नही गयी , हम साथ साथ ही रहे। किन्तु जब मै अकस्मात वंहा से आ गयी, तो बुआ के साथ ही, ममता पर भी बहुत बुरी बीती , ये बेहद बहुत नाजुक घड़ी थी , मेरा बुआ के घर से लौटना , क्यों हुआ , ये अगले अंक मे…। 

Wednesday, 7 August 2013

mere vatan

मेरा मन मेरा तन
सब तुझे अर्पण
मेरे वतन , मेरे वतन
कर  दूँ, तुझ पर
न्यौछावर प्राण
तुझसे ही मेरी
आन, बान औ शान
तुझे समर्पित
मेरा जीवन
ओ मेरे वतन
तू ही मेरा चमन
मेरा गगन
मेरा उपवन
तुझमे समाई
मेरी धड़कन
ये मेरे वतन
मेरे वतन
तुझको नमन
मेरे वतन
जोगेश्वरी 

Sunday, 4 August 2013

meri bachpan ki saheli, mamta

वो ममता है, मेरे बचपन की सहेली , अब जाने कंहा है, ये जानती हु, की जन्हा भी होगी खुश होगी।
हम दोनों इतनी पक्की सहेली थी, की हमारा नाम भी साथ में लेते थे, ममता जागेश्वरी ,यदि कंही मई दिखती, तो गाँव में मुझसे उसे पूछते, यदि वो दिखती तो, मुझे पूछते थे।  मई बुआ जी के घर रहती थी , तभी वो पहली से मेरी सहेली बन गयी थी।  हम साथ स्कूल जाते , कैसे? पहले मई उसके घर जाती , फिर हम दोनों अपना बैग लेके स्कूल तक दौड़ते जाते।  धीमे नही चलते थे, लौटते वक्त भी दौड़ते आते।  यंही नही जब भी गणेश जी व् दुर्गा जी के मेले जाते , इतने जोरों से दौड़ते, जैसे हमारे पीछे कोई चोर डाकू लगे हो।  हमारे खिलौने तो, हम एक साथ, एक बड़े डलिया में रखते, वो हम,से उठता नही तो, उसमे रस्सी बांध उसे दोनों मिलके खींचते। वो डलिया कुछ दिनों मेरे घर होता , तो कुछ दिनों उसके घर होता।
किन्तु, एक दिन हमारी दोस्ती में दरार आ गयी, वो भी किसी झगडे से नही , वरना हालत की वजह से। हमारे स्कूल में उन दिनों sesson के शुरू में दीवालों में डामर लगा रहे थे , वन्ही हम दोनों दीवाल से लगकर इसे ही खड़े थे, कि वो डामर ममता की फ्राक में लग गया, बीएस ममता को गुस्सा आ गया की, मैंने ही उसे डामर लगा दी, जबकि वो खुद दीवाल से लग गयी, और उसकी मामाजी की दी , प्रिय फ्राक भर गयी, डामर से अपनी favrit फ्राक को भरी देख, उसने मुझ पर ही दोष लगा दिया।  और मुझे मरने की धमकी दे दी।  फिर मै अपने मोहल्ले के साइड की लडकियों के बीच छिप के उसके घर के सामने से जाती, इस डर से, की वो मुझे मारेगी, और वो गुस्से से मुझे जाते देखती।
शेष कल 

Thursday, 1 August 2013

vnha, jakr darti hu

 नही होते  , सरकारी काम जल्दी से , रोज तहसील जाती हूँ , और वंहा काम कम नही होते किन्तु वंहा जेल के सामने एक पगली को जिन्दा-लाश बनी , जीर्ण हालत में देखती हूँ, तो रूह कांप जाती है सभी के घर में लडकियाँ है  , सोचती हूँ, क्या , यंहा के majistrate  व् स्प को, पुलिस वालों को, या जिला पंचायत वालों को  बदमाशों द्वारा लुटी जा रही , वो पगली नही दिखती।  मुझे उसे देखने के बाद सर में दर्द उठता है , कोई कम किये  लौट आती हूँ , बहुत डर लगता है ,जाने क्यूँ एस लगता है, जैसे वो हमारी त्रासदी है , अपना ही दुःख है , मै  उदाश हो जाती हूँ। बेटे के साथ होकर भी , मुझे दिलासा नही महसूस होती , लगता है ,मै जिस शहर में रह रही हूँ, वंहा कोई भी सदाचारी व् दयालु नही है , जो उस अनाथ बच्ची        पर दया करता 

Tuesday, 30 July 2013

angan me hoti thi, chameli

वो, बचपन के दिन थे
जब आँगन में होती थी
चमेली की बेल
मोंगरे की झाड़ियाँ
और आम की अमराईयों में
कुहुकती थी कोयल
बड़ी में लगती थी
जामुन अलमस्त गदराई सी
और दरिया में पानी
उछलते बहता था
तब, कितनी मासूमियत
बिछी होती थी
विस्तृत मैदानों में
हवा झूमती- बहती थी
खेतों में खलिहानों में

अभी लिखी ये कविता 

Sunday, 28 July 2013

shyama didi nhi rahi

श्यामा दी को यंहा बलाघात में ही आकर जनि, जबकि वो हमारे गाँव से ही थी . वो, मेरी सहेली शशि की सबसे बड़ी दीदी थी . मेरे जन्म के साल उनका ब्याह हुवा  था . एस आनंद  जीजा जी बताते है . उनके घर मेरा आना-जाना तबसे शुरू हुवा, जब मै पिछली बार बालाघाट में रहती थी .एक दिन अपरान्ह श्यामा दी मेरे घर आ  ई थी , और बोली, की तुझे तेरे जीजा ने बुलाये है . मई गयी, तभी उन दोनों से घरेलु स्नेह-पूरित सम्बन्ध रहे है . वैसे भी श्यामा दी की माँ मेरे बाबूजी को राखी बंधती थी . बाबूजी ने उनके ही नही , गाँव की कितनी शादियों में कन्हर लिए थे . वो वक्त ऐसा था ,जब मेरे पिता व् बुआ के परिवार का बहुत सम्मान रहा है ऽअज भी है  क़िन्तु श्यामा दी से मै पिछले एक माह से अपनी व्यस्तता वश नही मिल सकी . आज ही प्रात भोर के सपने में वो मुझे दिखी, कुछ कह रही थी ंऐ जब वंहा पंहुची, तो उनके जाने के बाद के दुखद निशान ही घर में मिले . आनंद जीजा जी से ज्यादा बातें नही हो सकी . तीसरे दिन के बाद जाकर उनसे बातें होगी, किन्तु श्यामा दी ने जैसे स्वप्न में आकर मुझे उनके जाने की बात कही , उससे यंही समझ में आता है, कि ये दुनिया किसी और ही परा शक्ति से चलती है. श्यामा दी , आप हमे बहुत यादआओगी 

Tuesday, 16 July 2013

smrti ke angan me

बहुत सा लिखना है , किन्तु आज नही 

Sunday, 7 July 2013

meri asflta

मै  जानती हूँ ,कि मै  बेहद असफल हूँ ,किन्तु मै अपनी सफलता के लिए क्या कर लूँ . आखिर मेरे पास साधन व् धन दोनों ही सिमित है , यंहा तक कि , मै लिखने वालों से अरसे से नही मिली हूँ . ये मेरी इसी सम्श्यायें  है , जिनसे मुझे रूबरू होना है. मै  अति पिछड़े इलाके में हूँ , जन्हा लोग लिखने का कोई मतलब नही जानते . मैंने हमेशा, यंही बताना चाहा है, की लिखने के लिए आप अपना सब कुछ होम कर देते है, बदले में आपको कुछ नही मिलता . एक वक्त के बाद, आप  इतना निराश हो सकते है, की आपको म्रत्यु तुल्य कस्त होता है .दुःख तब कई गुना बढ़ जाता है, जब आप ये पाते है, की आपने लिखने की खातिर अपने बेटे का जीवन भी दुखों से भर दिया है. ये सारे दुःख आपकी असफलता की कसक को बढ़ाते है. मुश्किल तब होती है, जब आप नही बता सकते की, ये दुनिया इतनी निर्मम है, की यंहा कोई आपका अपना नही होता .क्या कहूँ, इससे ज्यादा ......की कभी अपनी बात कहने का साहस नही हुवा, तो चुपचाप सहना ही सिखा . किसी के आगे रोना, या गिडगिडाना , ये स्वाभाव नही रहा , यंहा तक की, किसी की सहानुभूति पाने की भी इक्षा नही रहीफिर भी मैंने जिंदगी का दमन नही त्यागी , क्यूंकि, अपने उस बेटे के लिए तो मुझे हर हाल में जिन है , जिसने अपने जन्म से लेकर अभी तक मेरे लिए ही अपने जीवन को जिया .लोग उसे असफल कह सकते है, ये उनकी समझ है , क्यूंकि हम जिन हालातों से झुझे है , वो इतने भीषण थे , की आप होते , तो अपना आप खो देते . ये भी बता दू, की मेरी साहित्य या लेखन क्षेत्र में कोई पहचान नही है, जब दस-बीश रचना अस्वीकृत होती है, तब एकछपती है . ये बहुत यन्त्रणा दायक होता है , और क्या बताओं, की इस लेखन ने हजार जिंदगियां ली, तब एक को ख़ुशी नसीब हुयी .

Saturday, 29 June 2013

बुआ जी बहुत याद  आती है . वे जिस तरह , जीवन के अंतिम वक्त में अकेली हो गयी थी, उनके दत्तक बेटे ने उनकी जो गति की थी, ये याद करके , मन कांप जाता है .
उनके घर की बातें तो , कई बार दोहराती रही हूँ .किन्तु, मेरे उनके घर से लौट जाने के बाद वो कितनी दुखी हुई थी, इसका अनुमान आज लगती हूँ . माँ बता रही थी, कि वो मेरे आ जाने के बाद बहुत रोटी थी .अकेलापन कितना तोड़ देता है, ये बुआ जी की तब की हालत को याद करके सोचती हूँ .
वो, नींद में जोरों से चीखती थी, किन्तु जागने पर अपना दुःख नही बयाँ कर  पाती थी, सच , बुआ जी, मै आपकी मदद नही क्र सकी , क्यूंकि, तब मै जिन जंजालों में उलझी थी, मेरी हालत भी तो, कतई ठीक नही थी .मै तो, अपने होशो-हवाश में तक नही थी . मुझे psc या cj दो ही जॉब के torget पूरे करने थे .